शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ
पृष्ठ 64, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 64
28 शार्ङ्गधरसंहिता [ पूर्वखण्डे
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### [बायाँ स्तम्भ]
**कफदोष में नाड़ी की गतियाँ**
हंस-पारावतगतिं धत्ते श्लेष्मप्रकोपतः ।
कफदोष का प्रकोप होने पर नाड़ी की गति हंस तथा पारावत (परेवा, कबूतर) के समान होती है। ये पक्षी स्वभावतः मन्दगामी होते हैं।
**सन्निपात में नाड़ी की गतियाँ**
लाव-तित्तिर-वर्त्तीनां गमनं सन्निपाततः ॥ ३ ॥
सन्निपात (तीनों दोषों का मिश्रण) होने पर नाड़ी कभी लाव (लवा नामक) पक्षी की भाँति तिरछी गति वाली, कभी तित्तिर (तीतर) की भाँति शीघ्र गति वाली और कभी वर्ती (बत्तख) के समान धीर गति वाली देखी जाती है।
**वक्तव्य-** आप इनकी गतियों पर ध्यान देंगे, तो आपको वात, पित्त तथा कफ दोषों के लक्षण स्वतन्त्र क्रम से देखने को मिलेंगे।
**द्विदोषज तथा असाध्य नाड़ी की गतियाँ**
कदाचिन्मन्दगमना कदाचिद् वेगवाहिनी।
द्विदोषकोपतो ज्ञेया, हन्ति च स्थानविच्युता ॥ ४ ॥
द्विदोष (दो-दो दोषों) के प्रकोप से प्रभावित नाड़ी कभी धीरे और कभी वेग से चलने (फड़कने) लगती है। जब कभी वह अपने स्थान से विच्युत हो जाती है, अर्थात् उसका स्पन्दन प्रतीत नहीं होता है, तो वह रोगी को मार डालती है। इसका तात्पर्य है कि वह रोगी के असाध्य होने की सूचना दे रही है।
**वक्तव्य-** 'स्थानविच्युता' अर्थात् अपने स्थान से हट जाना। यह लक्षण दस्तों के अधिक हो जाने पर या विसूचिका (हैजा) आदि रोगों में भी देखा जाता है। ऐसे रोगियों की यदि तत्काल चिकित्सा कर ली जाती है तो नाड़ी पुनः अपने स्थान पर आ जाती है, नहीं तो असाध्य तो वह हो ही गया है।
**प्राणनाशिनी नाड़ी**
स्थित्वा स्थित्वा चलति या सा स्मृता प्राणनाशिनी ।
अतिक्षीणा च शीता च जीवितं हन्त्यसंशयम् ॥ ५ ॥
जो धमनी रुक-रुककर अर्थात् दो-दो, तीन-तीन, सेकेण्ड तक रुक कर चलती है, वह मारने वाली होती है और अत्यन्त क्षीण (जो स्पर्श करने पर बहुत ही धीमी ज्ञात होती है) तथा शीत स्पर्श वाली धमनी भी जीवन को अवश्य नष्ट कर देती है। (इन सभी अवस्थाओं में उचित चिकित्सा करने पर कभी-कभी रोगी बच भी जाया करते हैं।)
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### [दायाँ स्तम्भ]
**वक्तव्य-** अर्श या बवासीर, आमवात तथा वातज प्रमेह आदि रोगों के लक्षणों में 'हद्ग्रह' नामक लक्षण कहा है। इसलिये उक्त रोगों के रोगियों की नाड़ी ठहर-ठहर कर चला करती है, परन्तु यह प्राणनाशिनी नहीं होती। जिन रोगों में 'हृदयस्तम्भ' नामक लक्षण कहा है, उन रोगों में हृदय-स्तम्भ या हार्टफेल से मृत्यु हो जाती है और जिनमें 'हृद्द्रव' नामक लक्षण कहा है, उन रोगों में नाड़ी की गति-संख्या बढ़ जाती है।
**ज्वर आदि में नाड़ी की गति**
ज्वरकोपे तु धमनी सोष्णा वेगवती भवेत्।
कामक्रोधाद् वेगवहा क्षीणा चिन्ताभयप्लुता ॥ ६ ॥
ज्वर का प्रकोप होने पर धमनी कुछ उष्ण तथा शीघ्रगामिनी हो जाती है। काम (मैथुन की इच्छा) से तथा क्रोध से वह जल्दी-जल्दी चलती है और चिन्ता तथा भय से क्षीण (पतली या हीनवेग) हो जाती है।
**मन्दाग्नि आदि में नाड़ी की गति**
मन्दाग्नेः क्षीणधातोश्च नाडी मन्दतरा भवेत् ।
असृक्पूर्णा भवेत् कोष्णा गुर्वी सामा गरीयसी ॥ ७ ॥
मन्दाग्नि (जिसकी पाचनशक्ति घट गयी है) तथा क्षीणधातु (जिसके धातु घट गये हैं) मनुष्य की धमनी अत्यन्त मन्द (वेगहीन) हो जाती है, रक्तविकार से कुछ उष्ण एवं भारी होती है और आमदोष (गठिया, आमवात, ऊरुस्तम्भ आदि रोगों) से धमनी अत्यन्त भारी प्रतीत होती है।
**वक्तव्य-** 'आहारस्य रसः शेषो यो न पक्वोऽग्निलाघवात्।
स मूलं सर्वरोगाणाम् 'आम' इत्यभिधीयते' ।। अर्थात् जो आहार रस अग्नि की दुर्बलता के कारण नहीं पका या पच सका वही सब रोगों का कारण होता है और उसे 'आम' कहते हैं।
**स्वस्थ आदि पुरुषों की नाड़ी**
लघ्वी वहति दीप्ताग्नेस्तथा वेगवती मता।
सुखितस्य स्थिरा ज्ञेया तथा बलवती स्मृता ॥ ८ ॥
चपला क्षुधितस्य स्यात् तृप्तस्य वहति स्थिरा।
दीप्ताग्नि (जिसकी पाचनशक्ति अत्यन्त बढ़ जाती है) जैसे भस्मक रोग में मनुष्य की धमनी हल्की एवं शीघ्र-शीघ्र चलती है। सुखी या नीरोग मनुष्य की धमनी स्थिर या उचित गतियुक्त एवं बलवान् होती है तथा भूखे मनुष्य की चञ्चल और तृप्त (भोजन किये हुये) मनुष्य की धमनी धीरतायुक्त होती है।
**वक्तव्य-** मनुष्य की विभिन्न अवस्थाओं में धमनी की