भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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पृष्ठ 83

पञ्चमोऽध्यायः] कलादिकाख्यानम् 47 तिल या क्लोम गर्भोत्पत्ति के समय रक्त तथा वायु से उत्पन्न होता है। उसका एक नाम 'कालीयक' भी है। वह जलवाही सिराओं का मूल है, इसलिये तृष्णा या पिपासा को आच्छादित करता है, अर्थात् उसको व्यवस्थित रखता है। वक्तव्य-'उदकवहानां स्रोतसां तालुमूलं क्लोम च'। देखें-च० वि० अ० 5। वृक्क-परिचय ( उत्पद्येते प्रसादाच्च मेदसः शोणितस्य च ।। 84 ।। ) वृक्कौ पुष्टिकरो प्रोक्तौ जठरस्थस्य मेदसः । मेदस् तथा रक्त के प्रसाद या सार से वृक्क उत्पन्न होते हैं और वे उदर की मेदस् को पुष्ट करते हैं। वक्तव्य-वृक्क दो होते हैं। 'मूत्रवहे द्वे' (सु० शा० अ० 9) तथा 'मूत्रवहानां स्रोतसी वस्तिमूलं वङ्कणौ च' (च० वि० अ० 5) और इन वाक्यों से यह भी ज्ञात होता है कि वृक्क मूत्र का भी वहन करते हैं। मूत्र के साथ पित्त के निकलते रहने से रक्त शुद्ध होता रहता है और लवण के निकलते रहने से मेदस् की पुष्टि होती रहती है। मूत्र मल है, अतः जो जल पिया जाता है, वह शरीर के उन पदार्थों को, जो शरीर को मलिन करते हैं या कर सकते हैं, लेकर मूत्र रूप से बाहर निकल जाता है। वृषण-परिचय ( उत्पद्येते प्रसादाच्च मांसासृक् कफमेदसाम् ।। 85 ।। ) वीर्यवाहिसिराधारौ वृषणौ पौरुषावहौ । 'वृषण' मांस, रक्त, कफ तथा मेदस् के प्रसाद या सारभाग से उत्पन्न होते हैं। वे वीर्यवाहिनी सिराओं के मूल हैं तथा पौरुष या पुरुषत्व या मैथुन-सामर्थ्य का वहन करते हैं। लिंग-परिचय ( ग्रीवाहृदयबद्धाभ्यः कण्डराभ्यः प्रजायते ।। 86 ।। ) गर्भाधानकरं लिङ्गमयनं वीर्यमूत्रयोः । ग्रीवा तथा हृदय से सम्बन्ध रखने वाली कण्डराओं से 'लिंग' का उत्पत्ति होती है। उसी से गर्भाधान होता है और वह वीर्य या शुक्र तथा मूत्र के निकलने का मार्ग है। गर्भाशय-परिचय ( शङ्खनाभ्याकृतिर्योनिस्त्र्यावर्त्ता सा च कीर्तिता ।। 87 ।। तस्यास्तृतीये त्वावर्त्ते गर्भशय्या प्रतिष्ठिता । ) योनि या भग की आकृति शंख की नाभि के समान होती है। उसमें तीन आवर्त्त होते हैं। उसके तीसरे आवर्त्त में 'गर्भशय्या' या गर्भाशय प्रतिष्ठित रहता है। वक्तव्य-लिंग एवं वृषण पुमान् या नर में व्यक्त और स्त्री या नारी में अव्यक्त होते हैं और योनि (भग) तथा गर्भाशय स्त्री में व्यक्त और पुरुष में अव्यक्त होते हैं और नपुंसक में ये चारों अंग अव्यक्त होते हैं। यह सिद्ध है कि यह चारों अंग नर, नारी एवं नपुंसक तीनों में है। अतएव सुश्रुत ने कहा है-'पुंसां पेश्यः पुरस्ताद् याः प्रोक्ता लक्षणमुष्कराः। स्त्रीणामवृत्य तिष्ठन्ति फलमन्तर्गतं हि ताः' ।। (सु० शा० अ० 5)। अर्थात् जो मांसपेशियां नर के लक्षण अर्थात् लिंग तथा मुष्क (वृषण) को बनाती हैं, वे ही नारी के फल अर्थात् गर्भाशय का निर्माण करती हैं। यही कारण है कि नर से नारी और नारी से नर तथा नर से नपुंसक बन जाते हैं। इन अंगों में विशेष प्रकार की उत्तेजना होने पर नर, नारी एवं नपुंसक में एक ही प्रकार की वासना उत्पन्न होती है; एक-सी ही रति तथा एक-सी ही तृप्ति होती है। शरीर-पोषण के प्रकार शिरा धमन्यो नाभिस्थाः सर्वा व्याप्य स्थितास्तनुम् ।। 88 ।। पुष्णन्ति चानिशं वायोः संयोगात् सर्वधातुभिः । शिरा तथा धमनियां नाभि (अर्थात् आमाशय एवं पक्वाशय का मध्य (अन्त्र नामक) स्थान से प्रारम्भ होकर सम्पूर्ण शरीर में फैली हुई रहती हैं और वे वायु के संयोग से सभी धातुओं द्वारा सम्पूर्ण शरीर का निरन्तर पोषण करती रहती हैं। वक्तव्य-प्राणी जो आहार ग्रहण करता है, उसका पाक अन्त्र में होता है। पाक होने पर जो रस बनता है, उसमें सब धातुओं के पोषक पदार्थ विद्यमान रहते हैं और उस रस को सिराएँ सम्पूर्ण शरीर में पहुँचाती रहती हैं, जिससे प्राणी का पोषण होता रहता है। यह क्रिया निरन्तर होती रहती है। स्मरण रहे कि नाभिस्थ प्राणवायु धमनियों के ध्मान से धकेला हुआ रससिराओं द्वारा सम्पूर्ण शरीर में घूमता है और उसे पुष्ट करता रहता है। 'अन्नं वै प्राणाः' (उपनिषद्) तथा 'पुष्यन्ति हि आहाररसात् रसरुधिरमांसमेदोऽस्थिमज्जशुक्रौजंसि' इति। देखें-च० सू० अ० 28। 3 तथा सु० सू० अ० 14। प्राणवायु द्वारा शरीर-पोषण नाभिस्थः प्राणपवनः स्पृष्ट्वा हृत् कमलान्तरम् ।। 89 ।। कण्ठाद् बहिर्निर्याति पातुं विष्णुपदामृतम् ।