भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 85, कुल 356 में से

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पृष्ठ 85

पञ्चमोऽध्यायः ] कलादिकाख्यानम् 49 स्वस्थ की परिभाषा ( समदोषः समाग्निश्च समधातुमलक्रियः ।। ९६ ।। प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ इत्यभिधीयते । एषां समत्वं यच्चापि भिषग्भिरवधार्यते ।। ९७ ।। न तत्स्वास्थ्यादृते शक्यं वक्तुमन्येन हेतुना । दोषादीनां त्वसमतामनुमानेन लक्षयेत् ।। ९८ ।। अप्रसन्नेन्द्रियं वीक्ष्य पुरुषं कुशलो भिषक् ।) जिस प्राणी के दोष (अर्थात् पाँच प्रकार का वात, पाँच प्रकार का पित्त तथा पाँच प्रकार का कफ) सम हों, अग्नि (जठराग्नि या पाचनशक्ति) सम हो तथा धातु (रसादि सातों धातुएँ), मल (मल, मूत्र तथा स्वेद आदि) तथा क्रिया (सोना, जागना आदि) सम हों, आत्मा, सभी इन्द्रियाँ और मन प्रसन्न हों, वह स्वस्थ कहा जाता है। चिकित्सक वर्ग इन दोष, धातु एवं मला की जिस 'समता' का निश्चय करता है, वह (समता) प्राणी की 'स्वस्थता' या नीरोगता के बिना और किसी भी कारण से नहीं कही जा सकती, अर्थात् प्राणी को स्वस्थ या प्रसन्न देखकर उसके दोष, धातु एवं मल 'सम' समझ लिये जाते हैं। कुशल चिकित्सक किसी भी पुरुष (प्राणी) को अप्रसन्नेन्द्रिय या दुःखी या रोगी देख कर के दोषादियों की असमता या विषमता का अनुमान कर ले, अर्थात् समझ ले कि अब इसके दोषादि 'सम' नहीं रह गये हैं। वक्तव्य-उक्त श्लोकों में 'सम' शब्द का अर्थ तुल्य या बराबर नहीं है। इसका अर्थ है, प्रकृतिस्थ या जितना होना चाहिये उतना। समता को जानने की विधि उक्त 97वें पद्य में दी गयी है। सृष्टि-क्रम ( जगद्योनेरनिच्छस्य चिदानन्दैकरूपिणः ।। ९९ ।। पुंसोऽस्ति प्रकृतिर्नित्या प्रतिच्छायेव भास्वतः ।) संसार की उत्पत्ति का क्रम-संसार के मूल कारण, वासना रहित, ज्ञान-स्वरूप एवं आनन्द स्वरूप पुरुष (परम पुरुष या ईश्वर) की प्रकृति वैसी नित्य (अनादि एवं अविनाशी) है, जैसे तेजःस्वरूप भगवान् सूर्य का प्रतिबिम्ब होता है। वक्तव्य-ईश्वर नित्य है और प्रकृति भी नित्य है, ईश्वर चित्स्वरूप या चेतन शक्ति है, किन्तु प्रकृति जड़ या अचेतन है और प्रकृति के संयोग से ही ईश्वर जगद्योनि या जगत्-कारण होता है। प्रकृति-रहित या शुद्ध परमात्मा इच्छा-रहित या वासना-रहित है। ज्ञान और आनन्द ही एकमात्र उसका लक्षण है। जिस प्रकार सूर्य के प्रकाश और सूर्य के मण्डल का नित्य सम्बन्ध है, उसी प्रकार प्रकृति तथा पुरुष का भी नित्य सम्बन्ध है। सृष्टि में प्रकृति का योगदान अचेतनापि चैतन्ययोगेन परमात्मनः ।। १०० ।। अकरोद् विश्वमखिलमनित्यं नाटकाकृति । प्रकृति यद्यपि अचेतन या जड़ है, तथापि उसने परमात्मा की चेतन शक्ति के संयोग से इस सम्पूर्ण विश्व की रचना की है, जो कि नाटक के समान अनित्य अर्थात् एक ही रूप में रहने वाली नहीं है। वक्तव्य-जैसे नाटक के पात्र अनेक रूप बदलते रहते हैं-एक ही मनुष्य कभी स्त्री का रूप धारण करता है तो कभी पुरुष का, कभी मालिक का, तो कभी नौकर का, कभी धनी का तो कभी निर्धन का; ठीक इसी प्रकार एक ही जीव अनेक रूप धारण करता है-कभी मनुष्य का तो कभी स्त्री का, कभी कीट का तो कभी पतंग का, कभी वृक्ष का तो कभी लता का। प्रकृति और पुरुष से निर्मित संसार के सभी पदार्थ परिवर्तनशील हैं। एक पदार्थ जिस रूप में आज दिखलायी दे रहा है, कल वह दूसरे ही रूप में परिवर्तित हो जाता है। अतएव संसार नाटकों के दृश्यों की भाँति अनित्य कहा गया है। बुद्धि आदि तत्त्वों की उत्पत्ति प्रकृतिर्विश्वजननी पूर्वं बुद्धिमजीजनत् ।। १०१ ।। इच्छामयीं महद्रूपामहङ्कारस्ततोऽभवत् । त्रिविधः सोऽपि सञ्जातो रजःसत्त्वतमोगुणैः ।। १०२ ।। सम्पूर्ण विश्व को उत्पन्न करने वाली प्रकृति ने इच्छायुक्त या वासनायुक्त एवं 'महत् तत्त्वरूप' 'बुद्धि' को सर्वप्रथम उत्पन्न किया। उस बुद्धितत्त्व से 'अहङ्कार' की उत्पत्ति हुई। वह अहंकार भी रजोगुण, सत्त्वगुण एवं तमोगुण के कारण तीन प्रकार का हो गया। वक्तव्य-प्रकृति और पुरुष के संयोग से उत्पन्न होने वाले प्राणी में पहले अनुभवशक्ति उत्पन्न होती है, जिसमें इच्छा या वासना रहती है। इस वासनायुक्त बुद्धितन्त्र से अहंकार या अहंभाव उत्पन्न हो जाता है और वह अहंकार तीन प्रकार का होता है-1. रजोगुण युक्त या रागात्मक प्रेम या भक्ति करने वाला; 2. सत्त्वगुण युक्त रागरहित सुख-दुःख के द्वन्द्वों में समानभाव से रहने वाला; और 3. तमोगुणयुक्त द्वेष, शत्रुता आदि दुर्भावनावों से युक्त।

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