भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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षष्ठोऽध्यायः] आहारदिगतिकथनम् 55 द्रवरूप है तथा स्नेहन, जीवन, तर्पण एवं धारण आदि सद्गुणों के कारण सौम्य अर्थात् सोम के आह्लादक आदि गुणों से युक्त समझा जाता है। यही शुद्ध पोषक रस जब शुद्ध रंजक पित्त द्वारा रंग दिया जाता है, तो वह 'रक्त' कहा जाता है। यहाँ उसी रक्त का ग्रहण किया गया है। देखें-सु० सू० अ० 14। रसादि धातुओं का परिणाम-क्रम पाचिताः पित्ततापेन रसाद्या धातवः क्रमात्। शुक्रत्वं यान्ति मासेन तथा स्त्रीणां रजो भवेत् ।। 15 ।। सम्पूर्ण शरीरव्यापी पित्त के ताप से पकायी हुई रस आदि धातुएँ क्रमशः एक मास में शुक्र भाव को प्राप्त हो जाती हैं। उसी प्रकार स्त्रियों का 'रजस्' बन जाता है। वक्तव्य- शरीर के रस, रक्त आदि धातु तथा उपधातु आदि पदार्थों का निर्माण तीन प्रकार से होता है-1. रस से रक्त, रक्त से मांस एवं मांस से मेदस् आदि। 2. 'तत्रैषां (धातूनां) अन्नपानरसः प्रीणयिता' तथा 3. 'तेषां (धातूनाम्) क्षयवृद्धी शोणितनिमित्ते' अर्थात् अन्नपान का रस ही सभी धातुओं का पोषण करता है और धातुओं का क्षय एवं वृद्धि रस से ही होती है। गर्भावतरण-क्रम कामान्मिथुनसंयोगे शुद्धशोणित-शुक्रजः। गर्भः सञ्जायते नार्याः स जातो बाल उच्यते ।। 16 ।। सन्तानोत्पत्ति अथवा आनन्द या रतिसुख की कामना से नारी एवं नर का उपस्थेन्द्रिय-विषयक संयोग होने पर शुद्ध शोणित एवं शुक्र के सम्मिलन से उत्पन्न होने वाला गर्भ नारी के गर्भाशय में प्रादुर्भूत होता है। वह जब जन्म लेता है तो 'बाल' कहा जाता है। वक्तव्य-नर और नारी के जोड़े का नाम 'मिथुन' है। इसकी उपस्थ = लिंग एवं योनि सम्बन्धी एक विशिष्ट क्रिया का नाम 'मैथुन' है। इस क्रिया से कभी-कभी अर्थात् जब कभी शुक्र और शोणित शुद्ध होते हैं, तो गर्भाधान हो जाता है। यह जब तक गर्भाशय में रहता है तब तक भ्रूण या गर्भ और जन्म होने पर 'शिशु' कहलाता है। पुत्र-कन्या की उत्पत्ति में कारण आधिक्ये रजसः कन्या पुत्रः शुक्राधिके भवेत्। नपुंसकं समत्वेन यथेच्छा पारमेश्वरी ।। 17 ।। गर्भाधान के समय प्रायः रजस् अर्थात् शोणित की अधिकता से कन्या शुक्र की अधिकता से पुत्र और रजस् एवं शुक्र की समता से नपुंसक की उत्पत्ति होती है, अथवा जैसी परमेश्वर की इच्छा हो। वक्तव्य- 'यथेच्छा पारमेश्वरी' कहने का तात्पर्य यह है कि कभी-कभी उक्त प्रकार के विपरीत साँप, बिच्छू आदि भी उत्पन्न हो जाते हैं। देखें-सु० शा० अ० 2। कुछ जिज्ञासु आधुनिक पाश्चात्य पद्धति के ग्रन्थों में शुक्रगत कीटाणुओं की चर्चा एवं चित्रों को देखकर पूछा करते हैं कि भारतीय अथवा आयुर्वेद साहित्य में शुक्र के कीटाणुओं की चर्चा है कि नहीं? इसका संक्षिप्त समाधान इस प्रकार है-पुराणों में लोक की उत्पत्ति का क्रम इस प्रकार कहा गया है-विष्णु भगवान् क्षीरसागर में सहस्रों फणों वाले शेषनाग पर शयन करते हैं और उनके पास लक्ष्मी एवं गरुड़ आदि भी विराजमान रहते हैं, उनकी नाभि से नाल निकलती है, उस पर कमल और कमल पर ब्रह्मा उत्पन्न होते हैं, उस समय सब ओर जल ही जल होता है इत्यादि और आयुर्वेद में 'एवमयं लोकसम्मितः पुरुषः' (च० शा० अ० 2.4)। अर्थात् इस प्रकार लोक के समान ही पुरुष भी है। तो अब विचार कीजिये, कि यह समानता किस प्रकार है-सातवीं धातु शुक्र क्षीरसागर है, उसमें सर्पाकार कीटाणु शेषनाग है, उसमें चेतनाधातु रूप (जीवात्मा) विष्णु हैं, बुद्धितत्त्व लक्ष्मी एवं मन गरुड़ है, अहंकार नारद है, जो वीणा बजाता हुआ उसकी स्तुति किया करता है। ये सभी सदैव भगवान् विष्णु के साथ ही रहते हैं- 'अतीन्द्रियैस्तैरतिसूक्ष्मरूपैः आत्मा कदाचित् न वियुक्तरूपः। न कर्मणा नैव मनो मतिभ्यां न चाप्यहङ्कारविकारदोषैः।।' (च० शा० अ० 2)। कर्मानुसार आत्मा अर्थात् भगवान् विष्णु गर्भाशय में प्रविष्ट हो जाता है अर्थात् गर्भाशय के किसी भाग में चिपक जाता है। उसकी नाभि से नाल अर्थात् गर्भनाल निकलती है, उस पर भ्रूण का शरीर बन जाता है, यह ब्रह्मा है। उस समय सब ओर गर्भोदक अर्थात् गर्भाशय में समुद्र-जल के समान खारा जल ही जल होता है। 'यथा लोकस्य सर्गादिस्तथा पुरुषस्य गर्भाधानम्' (च० शा० अ० 5)। अर्थात् जैसे लोक की सृष्टि होती है, वैसे ही पुरुष का गर्भाधान होता है। आशा है इस चर्चा से आपके प्रश्न का कुछ समाधान हो जायेगा। जातकर्म-संस्कार (जातमात्रस्य ताल्वोष्ठकण्ठनासाप्रमार्जनम्। कुर्यात् सतुलयाऽङ्गुल्या सर्पिःसैन्धवलिप्तया ।। 18 ।।)