शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 101, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंकां० १, अ० ४, ब्रा० ४, कं० १-५ शतपथब्राह्मण / ८३ अपने कान को आग में डाल दिया । तुझे अपने कान से पीड़ा होगी, तू बहरा हो जायगा और ऐसा ही होगा भी ॥१४॥ और अगर पाँचवीं सामिधेनी के पढ़ते समय कोई बुरा कहे तो उसके प्रति कहना चाहिए कि तूने अपनी वाणी को आग में डाल दिया । तुझे अपनी वाणी से पीड़ा होगी, तू बहरा हो जायगा और ऐसा ही होगा भी ॥१५॥ और अगर छठी सामिधेनी के समय कोई बुरा कहे तो उसके प्रति कहना चाहिए कि तूने अपने मन को अग्नि में डाल दिया । यह मन तुझे पीड़ा देगा । तू इस प्रकार फिरेगा मानो किसी ने तेरा मन चुरा लिया है या तेरा मन विक्षिप्त हो गया है, और ऐसा ही होगा भी ॥१६॥ अगर सातवीं सामिधेनी के समय कोई बुरा कहे तो उससे कहना चाहिए कि तूने अपनी आँख आग में डाल दी । तुझे इस आँख से पीड़ा होगी, तू अन्धा हो जायगा और ऐसा ही होगा भी ॥१७॥ अगर आठवीं सामिधेनी पढ़ते समय बुरा कहे तो उससे कहना चाहिए कि तूने अपने मध्य प्राण को आग में डाल दिया । तुझे इस मध्य प्राण से पीड़ा होगी । तू इससे मर जायगा और ऐसा ही होगा भी ॥१८॥ अगर नवीं सामिधेनी को पढ़ते समय बुरा कहे तो उससे कहना चाहिए कि तूने अपने शिश्न को आग में डाल दिया । तुझे इससे पीड़ा होगी, तू नपुंसक हो जायगा और ऐसा ही होगा भी ॥१९॥ अगर दसवीं सामिधेनी को पढ़ते समय बुरा कहे तो उससे कहना चाहिए कि तूने अपने निचले प्राण को अग्नि में डाल दिया । इस अपने निचले प्राण से तुझे पीड़ा होगी, तू कब्ज से मर जायगा और ऐसा ही होगा भी ॥२०॥ अगर ग्यारहवीं सामिधेनी को पढ़ते समय बुरा कहे तो उसको कहना चाहिए कि तूने अपना शरीर आग में डाल दिया । तुझे इस अपने शरीर से पीड़ा होगी, इससे तू शीघ्र ही उस लोक को चला जाएगा और ऐसा ही होगा भी ॥२१॥ जिस-जिस प्रकार सामिधेनियों से जलाई हुई अग्नि के पास जाकरजो कोई पीड़ा उठाता है, उसी प्रकार की पीड़ा उस-उस पुरुष को होती है जो सामिधेनियों को समझकर पढ़नेवाले ब्राह्मण को बुरा कहता है ॥२२॥ अध्याय ४—ब्राह्मण ४ इस अग्नि को इन्होंने प्रज्वलित किया कि इस प्रज्वलित अग्नि में देवों के लिए आहुतियाँ दें । पहले इसमें दो आहुतियाँ देते हैं—एक मन के लिए और दूसरी वाणी के लिए, क्योंकि मन और वाणी दोनों मिलकर देवों के लिए यज्ञ को ले जाते हैं ॥१॥ यह जो चुपके-चुपके (धीमी आवाज से) किया जाता है, इस यज्ञ को मन देवों को ले जाता है, और जो वाणी से स्पष्ट करके किया जाता है उस यज्ञ को वाणी देवों तक ले जाती है। इस प्रकार दुहरी क्रियाएँ होती हैं। वह इन दोनों को तृप्त करता है जिससे ये दोनों (मन और वाणी) तृप्त और प्रसन्न होकर यज्ञ को देवों तक ले जायँ ॥२॥ जो आहुति मन के लिए देता है वह स्रुवा से देता है, क्योंकि मन पुरुष है और स्रुवा भी पुरुष है। (मन नपुंसक लिंग है। समझ में नहीं आता कि मन को पुरुष क्यों कहा) ॥३॥ जो आहुति वाणी के लिए देता है वह स्रुक् से देता है, क्योंकि वाणी स्त्री है और स्रुक् भी स्त्री है ॥४॥ जो आहुति मन के लिए देता है वह चुपके से देता है और 'स्वाहा' भी नहीं बोलता । मन