शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंका० १, अ० ४, ब्रा० ५, कं० १-७ शतपथब्राह्मण / ८७ अध्याय ४—ब्राह्मण ५ वह (अध्वर्यु) स्रुच् से दूसरी आधार-आहुति देते समय पहले अपने हाथों (अञ्जलि) को दोनों स्रुचों (अर्थात् जुहू और उपभृत्) के सामने जोड़ता है, और यह मन्त्रांश (यजु० २।७) पढ़ता है—"नमो देवेभ्यः स्वधा पितृभ्यः ।"—"देवों के लिए नमस्कार, पितरों के लिए स्वधा।" इस प्रकार वह ऋत्विज का कर्म करने से पहले देव और पितरों को प्रसन्न करता है। "सुयमे मे भूयास्तम्।" (यजु० २।७)—"आप दोनों मेरे लिए सुयम अर्थात् नियम में रहनेवाले हों।" ऐसा कहकर दोनों स्रुचों को लेता है। इससे अभिप्राय यह है कि मेरे ये दोनों स्रुच् अच्छी तरह भर जायें या मैं इनको अच्छी तरह भर सकूँ। अब वह कहता है—"अस्कन्नमद्य देवेभ्य आज्यꣳ सम्भ्रियासम्" (यजु० २।८)—"मैं आज देवों के लिए न फैलनेवाला घी अर्पण करूँ।" इसके कहने का तात्पर्य यह है कि मैं आज देवों के लिए क्षोभरहित अर्थात् पूर्ण यज्ञ करूँ। (अर्थात् यज्ञ में कोई विघ्न या त्रुटि न रहे) ॥१॥ अब वह कहता है—"अङ्घ्रिणा विष्णो मा त्वावक्रमिषम्।" (यजु० २।८)—"हे विष्णु, मैं पैर से आपके साथ अत्याचार न करूँ" अर्थात् आज्ञा भङ्ग न करूँ। यज्ञ ही विष्णु है। इसलिए तात्पर्य यह हुआ कि मैं पैर से यज्ञ के प्रति कोई अनाचार न करूँ। अब कहता है—"वसुमतीमग्ने ते छायामुपस्थेषम्" (यजु० २।८)—"हे अग्नि, मैं तेरी वसुमती छाया (शरण) में आ जाऊँ।" इससे तात्पर्य है कि 'हे अग्नि, मैं तेरी साधु अर्थात् अच्छी छाया में आ जाऊँ' ॥२॥ अब वह कहता है—"विष्णोः स्थानमसि" (यजु० २।८)—"तू विष्णु का स्थान है।" यज्ञ ही विष्णु है। वह उसी के निकट खड़ा होता है, इसीलिए कहता है कि 'तू विष्णु का स्थान है'। अब कहता है—"इत इन्द्रो वीर्यमकृणोत्" (यजु० २।८)—"यहाँ इन्द्र ने पराक्रम किया।" इन्द्र ने यहीं खड़े होकर दक्षिण से विघ्नकारी राक्षसों को दूर किया था। इसीलिए कहता है 'यहाँ इन्द्र ने पराक्रम किया'। अब कहता है—"ऊर्ध्वोऽध्वर आस्थात्" (यजु० २।८)—"अध्वर ऊँचा उठा।" अध्वर नाम है यज्ञ का, इसलिए इसका तात्पर्य हुआ कि यज्ञ ऊँचा उठा, अर्थात् यज्ञ भली प्रकार किया गया ॥३॥ अब कहता है—"अग्ने वेर्होत्रं वेर्दृत्यम्" (यजु० २।६)—"हे अग्नि, होता का और दूत का काम जानो" (वेः का अर्थ है समझो)। अग्नि देवों का होता भी है और दूत भी। इसके कहने का तात्पर्य यह है कि 'हे अग्नि, तुम होता का और दूत का दोनों काम समझ लो।' अब कहता है—"अवतां त्वां द्यावापृथिवी" "अव त्वां द्यावापृथिवी" (यजु० २।६)—"द्यौ लोक और पृथिवी लोक तेरी रक्षा करें।" तू द्यौ लोक और पृथिवी लोक की रक्षा कर, यह स्पष्ट है। अब पढ़ता है— "स्विष्टकृद् देवेभ्य इन्द्र आज्येन हविषाभूत् स्वाहा" (यजु० २।६)—"हे इन्द्र, घी हवि से देवों के लिए स्विष्टकृत् आहुति हो, स्वाहा।" इन्द्र यज्ञ-देवता है, इसीलिए कहा 'इन्द्र आज्येन' इत्यादि। यह आहुति वाणी के लिए देता है। इन्द्र नाम है वाणी का। यह कुछ लोगों की सम्मति है। इसी- लिए कहा 'इन्द्र आज्येन' इति ॥४॥ अब लौटकर दोनों स्रुचों को बिना छुवाये हुए ध्रुवा (के घी) से जुहू (का घी) मिलाता है। दूसरी आधार-आहुति यज्ञ का शिर है, और ध्रुवा शरीर है। इस कृत्य से यह तात्पर्य हुआ कि शरीर के ऊपर शिर रख देता है। दूसरी आधार-आहुति यज्ञ का शिर है। शिर कहते हैं 'श्री' को। श्री ही शिर होती है। इसीलिए जो कोई अङ्गों या परिवार का श्रेष्ठ होता है उसको कहते हैं कि यह अङ्गों या परिवार का शिर है ॥५॥ यजमान ध्रुवा के पीछे खड़ा होता है, और जो उसके लिए शत्रुता करे वह उपभृत् के पीछे। इसलिए अगर जुहू के घी को उपभृत् के घी से मिला देता तो उसको श्री देता जो यजमान का शत्रु है। परन्तु उसे यजमान को श्री देनी है, इसलिए वह ध्रुवा के घी से मिलाता है ॥६॥ वह मिलाते समय यह मन्त्रांश (यजु० २।६) पढ़ता है—"सं ज्योतिषा ज्योतिः"—"ज्योति