शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकां० १, अ० ५, ब्रा० १, कं० १-४ शतपथब्राह्मण / ८६ से ज्योति (मिल गई)।" एक में जो आज्य है वह ज्योति है। दूसरी में जो आज्य है वह भी ज्योति है। इस प्रकार दोनों ज्योतियाँ मिल गईं। इसलिए इस प्रकार मिलाता है ॥७॥ एक बार मन और वाणी में झगड़ा हुआ बड़ाई के लिए। मन और वाणी दोनों कहने लगे कि 'मैं भद्र हूँ'-'मैं भद्र हूँ' ॥८॥ अब मन ने कहा, 'मैं तुझसे अच्छा हूँ। मेरे बिना बिचारे तू कुछ नहीं कहती। तू मेरे किये का ही अनुकरण करती है। तू मेरा अनुसरण करती है। इसलिए तुझसे मैं बड़ा हूँ' ॥६॥ अब वाणी बोली, 'मैं तुझसे अवश्य बड़ी हूँ, क्योंकि जो तू जानता है उसे मैं प्रकाशित करती हूँ। मैं उसे फैलाती हूँ' ॥१०॥ वे प्रजापति के पास निश्चय के लिए गये। उस प्रजापति ने मन-अनुकूल निश्चय किया कि मन ही तुझसे श्रेष्ठ है, क्योंकि तू मन का ही अनुकरण करती और उसी के मार्ग पर चलती है। निश्चय करके वह छोटा है जो बड़ों का अनुसरण करता और उनके मार्ग पर चलता है ॥११॥ वह वाणी अपने विरुद्ध निश्चय को सुनकर खिन्न हो गई और उसका गर्भपात हो गया। उस वाणी ने प्रजापति से कहा, 'मैं कभी तेरे लिए हवि न ले जाऊँगी क्योंकि तूने मेरा विरोध किया।' इसलिए यज्ञ में जो कुछ प्रजापति के लिए किया जाता है वह मौन होकर पढ़ा जाता है, क्योंकि वाणी प्रजापति के लिए हवि का वाहक नहीं होती ॥१२॥ तब देव उस रेत (वीर्य) को चमड़े में या किसी अन्य चीज में ले आये। उन्होंने पूछा, 'अत्र ?' (अरे क्या यह यहाँ है ?) इस प्रकार अत्रि उत्पन्न हुआ (अत्र से अत्रि)। इसीलिए आत्रेयी स्त्री से समागम करने से दोष लगता है, क्योंकि देवी वाणी रूपी स्त्री से ये सब उत्पन्न हुए हैं। (आत्रेयी वह स्त्री है जिसका अभी गर्भपात हो चुका हो) ॥१३॥ अध्याय ५-ब्राह्मण १ अब वह (अध्वर्यु) प्रवर के लिए बुलाता है (होता के लिए जो वरण किया जाता है उसे प्रवर कहते हैं)। प्रवर के लिए बुलाने का कारण है कि बुलाना (आश्रावण) ही यज्ञ है। वह प्रवर के लिए इसलिए बुलाता है कि 'यज्ञ को कहकर अब मैं होता का वरण करूँ' ॥१॥ वह समिधाओं के बन्धन को (वह रस्सी जिससे लकड़ी बँधी रहती है) लेकर ही बुलाता है। क्योंकि यदि अध्वर्यु बिना यज्ञ को आरम्भ किये बुलाये तो या तो काँप जाय या उस पर और कोई विपत्ति आ पड़े ॥२॥ कुछ लोग वेदि में से बर्हि (कुश) लेकर बुलाते हैं या समिधा के टुकड़े को काटकर बुलाते हैं और समझते हैं कि 'यह यज्ञ की चीज है, इसलिए इस यज्ञ को लेकर बुलायेंगे।' परन्तु उसको ऐसा नहीं करना चाहिए, क्योंकि जिन चीजों से समिधायें बाँधी जाती हैं वे भी तो यज्ञ का अंश हैं, या वे चीजें जिनसे अग्नि की राख हटाई जाती है। इसलिए वह यज्ञ को लेकर ही बुलाता है। इसलिए समिधाओं के बन्धन को लेकर ही बुलावे ॥३॥ बुलाकर पहले उसका वरण करता है जो देवों का होता है अर्थात् अग्नि। इस प्रकार वह