भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 699 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 109

कां० १, अ० ५, ब्रा० १, कं० ४-१५ शतपथब्राह्मण / ६१ अग्नि और देव दोनों को प्रसन्न करता है। यह जो पहले अग्नि का वरण किया उससे अग्नि को प्रसन्न किया, और जो देवों के होता को पहले वरण किया इससे देवों को प्रसन्न किया ॥४॥ अब कहता है—'अग्नि देव, देवों का होता'। अग्नि ही देवों का होता है, इसलिए कहा 'अग्नि देव, देवों का होता'। इससे अग्नि और देव दोनों को प्रसन्न करता है। यह जो पहले अग्नि का वरण किया उससे अग्नि प्रसन्न हुई, और देवों के होता का पहले वरण किया उससे देव प्रसन्न हुए ॥५॥ अब कहता है—"देवान् यक्षद् विद्वाँश्चिकित्वान्"—"वह बुद्धिमान्, देवों को जानता हुआ यज्ञ करे।" यह जो अग्नि है वह देवों को भली-भाँति जानता है। इसलिए ऐसा कहने का तात्पर्य यह है कि वह जो देवों को जानता है विधिवत् यज्ञ करे ॥६॥ अब वह कहता है—"मनुष्वद् भरतवद्"—'मनु के समान, भरत के समान।' मनु ने ही पहले यज्ञ किया था और यह प्रजा उसी का अनुकरण करके यज्ञ करती है। इसलिए कहा, 'मनु का यज्ञ', इसलिए कहा, 'मनु के समान' ॥७॥ 'भरतवद्' क्यों कहा ? यही देवों के लिए हवि ढोता है, इसलिए अग्नि भरत है। ऐसा भी कहते हैं कि वह इन प्रजाओं को प्राण हांकर पालता है। इसलिए भी कहा, 'भरत के समान' ॥८॥ अब वह अग्नि को आर्ष होता के रूप में वरण करता है। इस प्रकार वह इस (अग्नि) को ऋषि और देव दोनों के प्रति निवेदन करता है। इसको आर्ष होता के रूप में इसलिए वरण करता है कि जो यज्ञ करता है वह महा-वीर्यवान् होता है ॥६॥ पहले से पीछे-पीछे का वरण करता है (अर्थात् पहले पूर्वज, फिर अनुज), क्योंकि प्रजा पीछे-पीछे उत्पन्न होती है। इस प्रकार वह बड़ों को प्रसन्न करता है। क्योंकि यहाँ पहले पिता होता है, फिर पुत्र, फिर पौत्र, इसीलिए वह सबसे पहले पूर्वज से आरम्भ करता है, फिर क्रमशः निचली श्रेणी को ॥१०॥ आर्ष होता का वरण करने के पश्चात् कहता है—"ब्रह्मण्वद्"— "ब्रह्म के समान"। ब्रह्म ही अग्नि है इसलिए कहा 'ब्रह्म के समान'। अब कहता है—"आ च वक्षत्"—"यहाँ लावे।" जिन-जिन देवताओं को बुलाना चाहता है उन-उनके लिए कहता है—'यहाँ लावे' (अर्थात् अग्नि अमुक-अमुक देवताओं को लावे) ॥११॥ ब्राह्मण इस यज्ञ के संरक्षक हैं। वही ब्राह्मण यज्ञ के संरक्षक हैं जो वेद के विद्वान् हैं, क्योंकि यही यज्ञ को फैलाते हैं, यही उसको उत्पन्न करते हैं। इसीलिए कहता है कि ब्राह्मण इस यज्ञ के संरक्षक हैं ॥१२॥ 'यह मनुष्य है।' अब वह इस मनुष्य को होता के रूप में वरण करता है। पहले वह 'अहोता' था (अर्थात् होता नहीं था), अब 'होता' हो गया ॥१३॥ वह वरण किया हुआ होता जप करता है। देवताओं के समीप दौड़ता है। देवताओं के पास दौड़ने का प्रयोजन यह है कि विधिपूर्वक देवों के लिए वषट्कार करे, विधिपूर्वक उनके लिए हवि ले जावे, अवहेलना न करे। इस प्रकार वह देवताओं के पास दौड़ जाता है ॥१४॥ वह यह जप करता है—"एतत् त्वा देव सवितर्वृणते"—'हे देव सविता, तुझको वरण करते हैं।' इस प्रकार वह सविता देवता के पास प्रसव के लिए अर्थात् प्रेरणा के लिए दौड़ता है, क्योंकि सविता देवताओं का प्रेरक है। अब कहता है—'अग्नि होत्राय' (अग्नि को होत्र के