शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 113, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंकां० १, अ० ५, ब्रा० २, कं० १-६ शतपथब्राह्मण / ९५ वह आहवनीय और गार्हपत्य अग्नि के बीच में बैठता है। ऐसा करने से वह दोनों को प्रसन्न करता है, और जब वह कहता है कि 'मुझे न जलाओ, मुझे न सताओ', तो वे उसको नहीं सतातीं ॥२५॥ अब आहवनीय अग्नि की ओर देखकर जप करता है—"विश्वे देवाः शास्त न मा यथेह होता वृत्तो मन वै यन्निषद्य । प्र मे ब्रूते भागधेयं यथा वो येन पथा हव्यमा वो वहानि"—'हे सब देवताओ, मुझे बताओ कि होता की हैसियत से मैं किस-किस चीज का ध्यान रखूं ? मेरे भागधेय अर्थात् कर्तव्य को कहो कि मैं किस रास्ते से आप तक आपके हवि को ले जाऊं ?" जैसे कोई किसी के लिए भोजन पकावे और कहे, 'मुझे आज्ञा दो कि मैं कैसे इसको तुम तक लाऊं, मैं किस प्रकार परोसूं ?' बस इसी प्रकार वह देवताओं के प्रशासन (आज्ञा) को चाहता है, अर्थात् 'मुझे बताइये कि मैं किस प्रकार आप तक वषट्कार पहुँचाऊँ या कैसे आप तक हव्य ले जाऊँ ।' इसीलिए ऐसा जपता है ॥२६॥ अध्याय ५—ब्राह्मण २ अब वह कहता है—"अग्निर्होता वेत्वग्नेर्होत्रम्"—"होता अग्नि, अग्नि के होत्र को जाने ।" इसका तात्पर्य यह है कि 'होता अग्नि इसको जाने'। 'अग्नि का होत्र' इसलिये कहा कि वह मोक्ष के इस साधन (प्रावित्र) को जाने । यज्ञ ही मोक्ष का साधन है । 'यज्ञ को जाने' का तात्पर्य है कि 'हे यजमान, देवता तेरे अनुकूल हैं' । इसका तात्पर्य है कि 'हे यजमान, जो अग्नि देवता तेरा होता है वह तेरे अनुकूल है।' अब वह कहता है—"घृतवतीमध्वर्यो स्रुचमास्यस्व ।" अर्थात् "हे अध्वर्यु, तू घी से भरे चमसे को ले ।" इस कथन से अध्वर्यु को प्रेरणा करता है। एक ही स्रुक् अर्थात् चमसा क्यों कहा ? इसलिए कि—॥१॥ जुहू के पीछे यजमान ही होता है, और जो उसका अनिष्ट चाहता है वह उपभृत् के पीछे । अब यदि दो चमसों का कथन करता तो यजमान के विरुद्ध अनिष्ट शत्रु को उद्यत कर देता । जुहू के पीछे खानेवाला है, और जिसको खाते हैं वह उपभृत् के पीछे है। अब यदि दोनों का कथन करता तो खानेवाले के विरुद्ध खाद्य पदार्थ को उद्यत कर देता । इसलिए एक ही चमसे का वर्णन किया ॥२॥ अब कहता है—"देवयुवं विश्ववाराम्", अर्थात् (वह चमसा) कैसा है ?—"देवताओं के लिए अर्पित और सम्पूर्ण समृद्धियों का रखनेवाला ।" 'देवों के लिए अर्पण और समृद्धियों से पूरित' कहकर वह उसकी स्तुति करता है अर्थात् उसको बड़ा बनाता है। अब कहता है—"ईडामहै देवान् । ईडेन्यान्"—"हम स्तुति के योग्य देवों की स्तुति करें"—"नमस्याम नमस्यान्"—"हम नमस्कार के याज्यों को नमस्कार करें ।" "यजाम यज्ञियान्"—"पूजा के योग्यों की पूजा करें ।" इसका अर्थ यह हुआ कि हम स्तुति के योग्य देवताओं की स्तुति करें। नमस्कार के योग्यों को नमस्कार करें। पूजा के योग्यों की पूजा करें। स्तुति के योग्य मनुष्य हैं, नमस्कार के योग्य पितर और पूजा के योग्य देवता ॥३॥ जो प्रजा यज्ञ में भाग नहीं लेती वह पराभूत अर्थात् दलित या पतित है। इसलिए जो पतित नहीं हैं उनको यज्ञ में शामिल करता है। मनुष्यों के पीछे पशु हैं, और देवों के पीछे पक्षी, ओषधि और वनस्पति है। इस प्रकार जो कुछ है उस सब को यज्ञ में शामिल किया जाता है ॥४॥ ये सब नौ व्याहृतियां होती हैं। पुरुष में नौ ही प्राण होते हैं। इनको उसमें धारण कराता है। इसलिए व्याहृतियां नौ हैं ॥५॥ यज्ञ देवताओं से भाग गया। देवता उसको बुलाने लगे, 'सुनो, लौटो !' यज्ञ ने कहा,