भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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कां० १, अ० ७, ब्रा० १, कं० १-११ शतपथब्राह्मण / १३१ भी होवे। इसलिए पलाश की शाखा से बछड़ों को हाँकता है ॥१॥ उस शाखा को यह मंत्र पढ़कर काटता है—‘‘इषे त्वोर्जे त्वा’’(यजु० १।१)—‘‘रस के लिए तुझे, अन्न के लिए तुझे।’’ जब वह कहता है ‘रस के लिए’ तो उसका तात्पर्य होता है ‘वृष्टि के लिए’, और जब कहता है ‘अन्न के लिए’ तो उसका तात्पर्य होता है उस भोजन से जो वृष्टि से उत्पन्न होता है ॥२॥ अब वह बछड़ों को अपनी माओं से मिला देते हैं। अब वह शाखा से बछड़े को छूता अर्थात् हाँकता है यह पढ़कर ‘‘वायव स्थ’’ (यजु० १।१)--‘‘तुम वायु हो।’’ यह जो चलता है (पवते) वही वायु है। यह वह है जो उस सबको लाता है, जो बरसता है। यह (शाखा) भी गायों को लाता है इसलिए कहा—‘तुम वायु हो।’ कुछ लोग कहते हैं—‘उपायव स्थ’—‘तुम निकटस्थ हो।’ परन्तु ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि इससे दूसरा (शत्रु) (यजमान के पास) आ जाता है ॥३॥ माओं में से एक को बछड़े से अलग करके उसको एक शाखा से यह मंत्र पढ़कर छूता है—‘‘देवो वः सविता प्रार्पयतु’’ (यजु० १।१)‘‘सविता देवता तुमको प्रेरणा करे।’’ सविता देवों का प्रसविता (प्रेरक) है। सविता की प्रेरणा से प्रेरित होकर वे यज्ञ करें। ऐसा सोचकर वह कहता है—‘सविता देव तुमको प्रेरणा करे’—॥४॥ श्रेष्ठतम कर्म के लिए। यज्ञ ही श्रेष्ठतम कर्म है। ‘यज्ञ ही के लिए’ कहने से तात्पर्य है ‘श्रेष्ठतम कर्म के लिए’ ॥५॥ ‘‘आप्यायध्वमघ्न्या इन्द्राय भागम्’’ (यजु० १।१)—‘‘हे अघ्न्याः (अर्थात् गौओ), इन्द्र के भाग के लिए फूलो-फलो।’’ जिस प्रकार आदि में देवता के लिए हवि लेकर आदेश देता है उसी प्रकार इस (दूध की आहुति) को देने में भी देवता का आदेश करता है जब कहता है कि- ‘हे गौओ, इन्द्र के भाग के लिए फूलो-फलो’ ॥६॥ ‘‘प्रजावतीरनमीवा अयक्ष्मा’’ (यजु० १।१) —‘‘प्रजा वाली, रोगरहित और यक्ष्मा- रहित।’’ यह तो स्पष्ट ही है। ‘‘मा व स्तेन ईशत माघशꣳस’’(यजु० १।१)—‘‘तुम पर चोर या पाप की चर्चा करनेवाला शासन न करे।’’ इससे उसका तात्पर्य यह है कि ‘तुम पर कोई दुरात्मा राक्षस शासन न करे।’ ‘‘ध्रुवा अस्मिन् गोपतो स्यात बह्वीः’’ (यजु० १।१)—‘‘इस गौओं के स्वामी में अवश्य ही बहुत होओ (फूलो-फलो)।’ यह कहने का तात्पर्य यह है कि ‘बिना त्यागे हुए इस यजमान के लिए बहुत होओ’ ॥७॥ अब वह आहवनीय अग्नि के सामने या गार्हपत्य अग्नि के सामने शाखा को छिपाता है यह कहकर—‘यजमानस्य पशून् पाहि’ (यजु० १।१)। इस प्रकार वह ब्रह्म के द्वारा यजमान के पशुओं को रक्षा के लिए इसके हवाले करता है ॥८॥ उसमें पवित्रा बाँधता है यह मंत्रांश पढ़कर ‘‘वसोः पवित्रमसि’’ (यजु० १।१)—‘‘तू यज्ञ का पवित्रा है।’’ यज्ञ ही वसु है इसलिए कहा ‘तू यज्ञ का पवित्रा है’ ॥६॥ अब इस रात को यवागू (जौ और गुड़ से बनता है) से अग्निहोत्र करता है। इस रात को जो दूध दुहता है वह तो देवता के लिए निर्दिष्ट हो चुकता है। इसलिए यदि उस दूध से हवन करे तो जो एक देवता के लिए हवि है वह दूसरे देवता के लिए दे देवे। इसलिये वह इस रात को यवागू से अग्निहोत्र करता है। जब अग्निहोत्र कर चुकते हैं तब तक बर्तन तैयार हो जाता है। इस पर (अध्वर्यु) कहता है—‘कहो कि वह (गाय) छोड़ दी गई।’ जब कहता है तो (गाय) छूट जाती है ॥१०॥ अब वह बर्तन को (गार्हपत्य अग्नि पर) मन्त्रांश पढ़कर रखता है—‘‘द्यौरसि पृथिव्यसि’’ (यजु०१।२)—‘‘तू द्यौ है। तू पृथिवी है।’’ ‘तू द्यौ है। तू पृथिवी है’ ऐसा कहकर वह उसकी बड़ाई