भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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कां० १, अ० ७, ब्रा० १, क० ११-१६ शतपथब्राह्मण / १३३ करता है-“मातरिश्वनो धर्मोऽसि” (यजु० १।२)-“मातरिश्वान् की घर्म (कड़ाही) है ।” ऐसा कहकर वह इस यज्ञ अर्थात् यज्ञ का साधन बनाता है, और जैसे प्रवर्ज्य-पात्र रखता है, इसी प्रकार इसे भी रखता है। अब कहता है-“विश्वधा असि परमेण धाम्ना दृꣲहस्व मा ह्वाः” (यजु० १।२) “तू विश्वधा अर्थात् सबको धारण करनेवाला है। परम धाम के सहारे दृढ़ हो। चलायमान न हो ।” इस प्रकार निश्चल कर देता है। “मा ते यज्ञपतिर्ह्वार्षीत्’ (यजु० १।२)-“तेरा यज्ञपति चलायमान न हो ।” यजमान ही यज्ञपति है। इसलिये वह इस प्रकार यजमान को ही निश्चल करता है ॥११॥ अब वह पवित्रा को रखता है। उसका पूर्व को मुख करके रखता है। पूर्व देवों की दिशा है। या उत्तर की ओर क्योंकि उत्तर मनुष्यों की दिशा है। वह वायु जो इन लोकों में आरपार बहता है वह पवित्र करनेवाला है। इसलिये (पवित्रे को) उत्तर की ओर रखता है ॥१२॥ जिस प्रकार पहले वह सोमराजा को पवित्रे से साफ करते थे उसी प्रकार वह (दूध को) साफ करता है। जिस पवित्रे से सोमराजा छाना जाता है उसका मुख उत्तर को होता है, इसलिये इस पवित्रे को भी उत्तर की ओर मुंह करके रखता है ॥१३॥ वह इसको यह मन्त्रांश पढ़कर रखता है-“वसोः पवित्रमसि” (यजु० १।३)। यज्ञ ही वसु है, इसलिये कहा-“वसु का पवित्रा है ।” ‘शतधारं’ ‘सहस्रधारं’ (यजु० १।३)। उसकी प्रशंसा और बड़ाई करता है जब कहता है कि-“तू सौ धारावाला, हजार धारावाला है” ॥१४॥ अब वह मौन रखता है जब तक तीन गौओं को न दुहे। वाणी ही यज्ञ है। इसका आशय है कि वह यज्ञ को निर्विघ्न करना चाहता है ॥१५॥ उस (दूध) को लाकर (पवित्रे में से छानता है तो) यह मन्त्र पढ़ता है-“देवस्त्वा सविता पुनातु वसोः पवित्रेण शतधारेण सुप्वा” (यजु० १।३)-“देव सविता तुझको यज्ञ के सौ धारवाले और अच्छी तरह पवित्र करनेवाले पवित्रे के द्वारा शुद्ध करे ।” जैसे पहले सोमराजा को पवित्रे से छानते हैं उसी प्रकार उसको भी छानते हैं ॥१६॥ अब पूछता है-“कामधुक्षः” (यजु० १।३)-“(काम्) किसको (अधुक्षः) तूने दुहा ?” वह उत्तर देता है-“अमूम्”-“इसको ।” “सा विश्वायुः”(यजु० १।४)-“यह सब चीजों की आयु या जीवन है ।” अब दूसरी (गाय) के विषय में पूछता है-“कामधुक्षः ।’-“किसको दुहा ?” वह उत्तर देता है-“अमूम्”-“इसको।” “सा विश्वकर्मा”(यजु० १।४)-“वह विश्व को रचनेवाली है ।” अब तीसरी (गाय) के विषय में पूछता है-‘कामधुक्षः”-“किसको दुहा ?” वह उत्तर देता है-“अमूम्”-“इसको।” “सा विश्वधाया” (यजु० १।४) “वह संसार को धारण करनेवाली है ।” यह जो पूछता है तो मानो उनमें वीर्य (शक्ति) का संचार करता है। तीन (गायों) को दुहता है। तीन लोक हैं। इस प्रकार वह इनको लोकों के योग्य बनाता है। अब वह (मौन को तोड़कर) इच्छानुसार बोल सकता है ॥१७॥ आखिरी (गाय) को दुहकर जिस पात्र में गाय दुहाई थी उसी में एक बूंद जल डालकर और हिलाकर ले आता है कि इसमें जो कुछ दूध का अंश बचा था वह भी इसी में आ जाय। यह उस रस को पूर्ण करने के लिए करता है। जब वर्षा होती है तो वनस्पतियाँ उत्पन्न होती हैं। वनस्पतियों को खाकर और जल को पीकर यह रस बनता है। इसलिये रस की पूर्णता के लिए (जल डालता है)। अब वहाँ से (आग पर से) लाकर उसको गाढ़ा करता है, तेज करता है। इसीलिये वह उसको (आग पर से) लाकर गाढ़ा करता है ॥१८॥ वह नीचे के मन्त्र से गाढ़ा करता है-“इन्द्रस्य त्वा भागं सोमेनातनच्मि” (यजु० १।४)-“इन्द्र के तुझ भाग को सोम से गाढ़ा करता हूँ ।” जैसे पहले देवता के लिए हवि देते हुए