भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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का० १, अ० ७, ब्रा० ३, कं० १०-१८ शतपथब्राह्मण / १४३ को दे।' इससे सोम आज्य का तात्पर्य है। 'अग्नि के प्रिय धामों को दे'—इससे जो अग्नि का पुरोडाश है उससे तात्पर्य है ॥१०॥ अब देवताओं के लिए—'वह आज्य पीनेवाले देवों के लिए प्रिय धामों को देवे।' इससे प्रयाज और अनुयाज से तात्पर्य है, क्योंकि प्रयाज और अनुयाज ही आज्य पान करनेवाले देव हैं। 'वह होता अग्नि के प्रिय धामों का यज्ञ करे।' यहाँ अग्नि का होता के रूप में तात्पर्य है। क्योंकि जब देवों ने उसके लिए अलग आहुति विचार कर ली, उन्होंने उसको इसके द्वारा शान्त किया, और उसको उसके प्रिय धाम (पदार्थ) के लिए बुलाया। इसी प्रयोजन से वह इस प्रकार सोचता है ॥११॥ कुछ लोग अयाट्कार से पहले देवताओं का नाम लेते हैं। इस प्रकार—'अग्नेः अयाट्' (अग्नि का [भाग] देवें)। 'सोमस्य अयाट्' (सोम का [भाग] देवें)। परन्तु ऐसा नहीं करना चाहिए, क्योंकि जो 'अयाट्' से पहले देवता का नाम लेते हैं, वे यज्ञ का क्रम बिगाड़ देते हैं। क्योंकि 'अयाट्' पहले कहकर ही यज्ञ में जो पहले कहना चाहिए वह कहा जाता है, इसलिये पहले अयाट्कार ही कहना चाहिए॥१२॥ अब होता अग्नि को सम्बोधन करके कहता है- "यज्ञत् स्वं महिमानम्"- 'अपनी महिमा के लिए यज्ञ करे।" जहाँ इस प्रकार अग्नि के द्वारा देवताओं का आवाहन करता है वह (अग्नि की) निज महिमा का भी आवाहन करता है। इससे पहले उसकी निज महिमा के लिए कुछ नहीं किया गया, इसलिये इस प्रकार उसको प्रसन्न करता है। इसलिये (अग्नि की स्थापना) विद्या निवारण के लिए होती है। इसलिये कहा- 'अपनी महिमा के लिए यज्ञ करे' ॥१३॥ अब कहता है- "आ यजतामेज्या इषः"- "यज्ञ के योग्य अन्न का यज्ञ किया जाय।" इष (अन्न) का अर्थ है यहाँ 'प्रजा' से। इस प्रकार प्रजाओं को यज्ञ करने के प्रति उत्साही बनाता है। ये प्रजा के लोग यज्ञ, पूजा और श्रम करते रहते हैं। ('प्रजा' का अर्थ उत्पन्न हुए प्राणी आदि) ॥१४॥ अब कहता है- "अध्वरा जातवेदा जुषताꣳ हविः"- "हानि न पहुँचानेवाले और सब उत्पन्न हुए पदार्थों को जाननेवाले (देव) पवित्र हवि को करें।" इस प्रकार वह यज्ञ की समृद्धि को चाहता है। क्योंकि यदि देवों ने हवि ले ली तो मानो उसकी बड़ी सफलता हो गई, इसलिये कहता है- 'हवि को ले' ॥१५॥ यहाँ 'याज्य' और 'अनुवाक्य' बहुत-कुछ एक-से हो जाते हैं। स्विष्टकृत् तृतीय सवन (सायंकाल का यज्ञ) है। तृतीय सवन विश्वे देवों का होता है। "पिप्रीहि देवाँ उशतो यविष्ठ।"— "हे सबसे युवा ! तुम इच्छुक देवों को प्रसन्न करो।" यह अंश अनुवाक्य का वैश्वदेव के लिए है। "अग्ने यदद्य विशोऽध्वरस्य होतः"- "हे यज्ञ के होता अग्नि ! जो तुम आज लोगों के पास (आओ)।" याज्य का यह भाग वैश्व देवों के लिए है। चूंकि इन दोनों का ऐसा रूप है इसलिये यह तृतीय सवन का रूप है। इसीलिये इस स्थान पर याज्य और अनुवाक्य बहुत-कुछ एक-से हो जाते हैं ॥१६॥ ये दोनों त्रिष्टुभ् के होते हैं। यज्ञ में जो स्विष्टकृत् है वह वास्तु के समान है। वास्तु वीर्यहीन अर्थात् निर्बल होती है। त्रिष्टुभ् वीर्यवान् है। इस प्रकार स्विष्टकृत् में वीर्य (बल) धारण कराता है। इसीलिये ये दोनों त्रिष्टुभ् हैं ॥१७॥ या वे दोनों अनुष्टुभ् होते हैं। अनुष्टुभ् वास्तु है। स्विष्टकृत् वास्तु है। इस प्रकार वास्तु