शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 167, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंकां० १, अ० ७, ब्रा० ४, क० ८-१६ शतपथब्राह्मण / १४६ भाग) है ॥८॥ जब वह प्राशित्र को काटता है तो मानो यज्ञ का वह भाग काटता है जो (तीर से) बिंधा हुआ था जो रुद्र का भाग था । अब वह जलों को छूता है। जल शान्ति है। इस प्रकार जलों के द्वारा शान्त करता है। अब इडा को जो पशु (का प्रतिनिधि) है, काटता है ॥९॥ उसको बहुत थोड़ा भाग काटना चाहिए । इससे तीर निकल आता है। इसलिए थोड़ा- सा ही काटना चाहिए। अब एक ओर घी रखे, चाहे नीचे, चाहे ऊपर । इस प्रकार जो कठोर है वह नरम हो जाता है और बहने लगता है। इसलिए एक ओर घी रखे, चाहे नीचे, चाहे ऊपर ॥१०॥ घी से चुपड़कर हवि से दो टुकड़े काटकर ऊपर घी लगाता है, क्योंकि ऐसा करने से ही वह यज्ञ का भाग होता है ॥११॥ उसको (आहवनीय अग्नि के) पूर्व में न ले जाये । कुछ लोग पूर्व में ले जाते हैं, क्योंकि पूर्व में पशु यजमान की ओर मुंह करके खड़े होते हैं। यदि पूर्व को ले जायगा तो पशुओं में रुद्र की शक्ति दे देगा, और उसके घरवाले पशु नष्ट हो जायेंगे। इसलिए उसको इस प्रकार मुड़कर ले जाना चाहिए। इससे वह पशुओं में रुद्र की शक्ति न देगा और इस (तीर) को मुड़कर निकाल देगा ॥१२॥ उसको वह इस मंत्र से ग्रहण करता है, "देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्याम्पूष्णो हस्ताभ्यां प्रतिगृह्णामि" (यजु० २।११)- "तुझको सविता देव की प्रेरणा से, अश्विनों की भुजाओं से, पूषा के हाथों से ग्रहण करता हूँ" ॥१३॥ अब जैसे बृहस्पति पहले प्रेरणा के लिए सविता के पास गया, क्योंकि देवताओं का प्रेरक सविता है और उससे कहा, 'प्रेरणा कर', उसने प्रेरणा की और सविता से प्रेरित होकर उसने हानि नहीं पहुँचाई, इसी प्रकार यह पुरोहित भी सविता के पास प्रेरणा के लिए जाता है, और कहता है, 'मुझे प्रेरणा कर ।' क्योंकि सविता देवों का प्रेरक है, सविता उसको प्रेरणा करता है और प्रेरित होकर वह उसको हानि नहीं पहुँचाता ॥१४॥ उस प्राशित्र को इस मन्त्र से खाता है, "अग्नेष्ट्वास्येन प्राश्नामि" (यजु० २।११)-"मैं तुझे अग्नि के मुँह से खाता हूँ।" अग्नि को कोई हानि नहीं पहुँचाता । इसी प्रकार इस पुरोहित को भी यह हानि नहीं पहुँचाता ॥१५॥ इसको दाँतों से न चबावे । 'कहीं यह रुद्र का भाग मेरे दाँतों को हानि न पहुँचावे !' इसलिए वह इसको दाँतों से न चबावे ॥१६॥ अब जल से आचमन करता है। जल शान्ति है, इसलिए जलरूपी शान्ति से शान्त करता है। अब पात्रों को धोकर- ॥१७॥ वे उसके पास ब्रह्म-भाग को लाते हैं। वस्तुतः ब्रह्मा यज्ञ के दक्षिण भाग में संरक्षक होकर बैठता है। वह इस भाग के सामने बैठता है। जो प्राशित्र था वे उसके पास ले आये और उसने खा लिया। अब जो ब्रह्म-भाग वे उसके पास लाते हैं वह उसको अपने भाग के रूप में लेता है। अब यज्ञ का जो भाग अधूरा रहता है वह उसकी रक्षा करता है। इसलिए वे उसके लिए ब्रह्म- भाग को लाते हैं ॥१८॥ अब वह चुपचाप रहे जब तक (अध्वर्यु) न कहे कि, 'हे ब्रह्म ! मैं आगे चलूँ?' जो