भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

पृष्ठ 177, कुल 699 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 177

कां० १, अ० ८, ब्रा० १, क० ३१-४१ शतपथब्राह्मण / १५६ 'उत्तरा देवयज्या' का अर्थ है 'सन्तान' ॥३१॥ इस प्रकार वह परोक्ष-रीति से पशुओं के लिए भी आशीर्वाद देता है, क्योंकि जिसके पशु हैं वह जैसे उसने पहले यज्ञ किया उसी प्रकार फिर भी यज्ञ करेगा ॥३२॥ अब कहा, "भूयसि हविष्करणऽउपहूतः"--"वह बहुत ज्यादा हवि देने के लिए बुलाया गया।" इस प्रकार वह उसकी जीविका के लिए परोक्ष-रीति से आशीर्वाद देता है, क्योंकि जैसे उसने पहले यज्ञ किया इस प्रकार जीता रहेगा तो आगे भी यज्ञ करेगा ॥३३॥ इससे वह परोक्ष रूप से सन्तान के लिए भी आशीर्वाद देता है, क्योंकि जिसके सन्तान होती है वह चाहे अकेला ही हो सन्तान द्वारा दश गुनी हवि देता है। इसीलिये कहा कि 'सन्तान का अर्थ है बहुत-सी हवि देना' ॥३४॥ इस प्रकार वह परोक्ष रूप से पशुओं के लिए भी आशीर्वाद देता है। जिसके पशु होते हैं वह पहले जैसे यज्ञ करता था फिर भी अधिक यज्ञ करता है ॥३५॥ अब आशीर्वाद यह है, "जीवेयं प्रजा मे स्याच्छ्रियं गच्छेयम्"--"मैं जियूं। मेरी प्रजा हो, मेरी सम्पत्ति हो।" 'पशुओं के लिए आशीर्वाद' से तात्पर्य है 'सम्पत्ति से', क्योंकि पशु ही सम्पत्ति हैं। इन दो आशीर्वादों में सब आ गया, इसलिए यहाँ दो आशीर्वाद किये जाते हैं ॥३६॥ अब कहता है, "देवा म इदं हविर्जुषन्ताम्"--"देव मेरी इस हवि को स्वीकार करें।" 'इसी यज्ञ में बुलाया गया' - यह जो देव हवि को स्वीकार करते हैं मानो यज्ञ की समृद्धि के लिए ही आशीर्वाद देते हैं। इससे बड़ी जय होती है। इसलिए कहा, 'स्वीकार करें' ॥३७॥ (यजमान और पुरोहित) उस (इडा) को खाते हैं। अग्नि में नहीं छोड़ते। इडा का अर्थ है पशु। इसलिए अग्नि में नहीं छोड़ते कि कहीं पशुओं को अग्नि में न छोड़ दें ॥३८॥ प्राणों में ही आहुति दी जाती है, कुछ होता में, कुछ यजमान में, कुछ अध्वर्यु में। अब पुरोडाश का पूर्वार्द्ध काटकर ध्रुवा में रखता है। ध्रुवा यजमान है, इसलिए यजमान इसको खाता है। यदि वह प्रत्यक्ष में उसे नहीं भी खाता है कि कहीं यज्ञ की समाप्ति के पहले खा लूं, तो भी वह खाई हुई समझ ली जाती है। सब खाते हैं। तात्पर्य है कि 'सब में ये मेरे लिए हुत होवें'। पांच इसमें से खाते हैं। इडा का अर्थ है पशु। पशु पांच प्रकार के होते हैं। इसलिए पांच इसमें से खाते हैं ॥३९॥ जब (होता) जोर से बोलता है तो वह (अध्वर्यु) पुरोडाश के चार भाग करके कुशों पर रखता है। वह यहाँ पितरों के स्थान पर होता है। अवान्तर दिशायें चार होती हैं। अवान्तर दिशा ही पितर हैं। इसलिए पुरोडाश के चार भाग करके उनको कुशों पर रखता है ॥४०॥ और जब वह कहता है, 'उपहूते द्यावापृथिवी'--'द्यावा-पृथिवी बुलाये गये', तो उसको अग्नीध्र को दे देता है। अग्नीध्र (उनमें से दो टुकड़ों को) यह मन्त्र पढ़कर खाता है, "उपहूता पृथिवी मातोप मां पृथिवी माता ह्वयतामग्निरानीध्रात् स्वाहा" (यजु० २।१०)--"उपहूतो द्यौष्पितोप मां द्यौष्पिता ह्वयतामग्निरानीध्रात् स्वाहा" (यजु० २।११)-"बुलाई गई पृथिवी माता। पृथिवी माता मुझे बुलावे। अग्नीध्र होने के कारण मैं अग्नि हूँ", "बुलाया गया द्यौ पिता। द्यौ पिता मुझे बुलावे। अग्नीध्र होने के कारण मैं अग्नि हूँ।" यह जो अग्नीध्र है वह मानो द्यावा-

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग) · पृष्ठ 177, कुल 699 में से · BharatKosha