शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकां० १, अ० ६, ब्रा० १, कूं० १-८ शतपथब्राह्मण / १७३ धत्तम् ।"—"आप घी के प्रेमी हैं, धुरियों की रक्षा करो । आप भद्र हैं, मेरे लिये भद्र कीजिये ।" इससे तात्पर्य है कि आप साधु हैं मुझे साधुत्व दीजिये ॥२७॥ अध्याय ६–ब्राह्मण १ अब अध्वर्यु कहता है—"इषिता दैव्या होतारो भद्रवाच्याय प्रेषितो मानुषः सूक्तवाकाय।" अर्थात् "देवों के होता लोग बुलाये गये कल्याण को कहने के लिए और होता सूक्तवाक के लिए" और जब उस पर होता सूक्त कहता है तो वह यजमान के लिए आशीष देता है । वह यज्ञ के पीछे ही आशीष देता है। दो कारण हैं कि वह यज्ञ के पीछे आशीष देता है ॥१॥ जो यज्ञ करता है वह यज्ञ को उत्पन्न करता है। इसी की आज्ञा से ऋत्विज यज्ञ को तानते अर्थात् उत्पन्न करते हैं। अब (होता) आशीष देता है। यह यज्ञ उस आशीष को उसी के लिए मानता है जो आशीष दी जाती है, क्योंकि (यज्ञ समझता है कि) मुझे इसने उत्पन्न किया । इसलिये यज्ञ के अनन्तर ही आशीष दी जाती है ॥२॥ जो यज्ञ करता है वह देवों को अवश्य ही प्रसन्न करता है। इस यज्ञ से देवों को ऋचाओं, यजुओं तथा आहुतियों द्वारा प्रसन्न करके वह देवों का हिस्सेदार हो जाता है। और जब हिस्सेदार हो गया तो होतृ उसके लिए आशीष देता है। इस-उसकी दी हुई आशीष को देवता लोग (यजमान के लिए) मानते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि उसने हमें प्रसन्न किया है। इसलिये भी वह यज्ञ के पश्चात् आशीष देता है ॥३॥ अब वह जपता है— "इदं द्यावा पृथिवी भद्रमभूत्"—"हे द्यौ और पृथिवि ! यह भद्र हो गया।" जिसने यज्ञ समाप्त कर लिये उसके लिए अवश्य ही कल्याण हो गया । "आर्ध्म सूक्त- वाकमुत नमो वाकम्"—"हमने सूक्तवाक् और नमोवाक् कह दिया", क्योंकि यह सूक्तवाक् और नमोवाक् यज्ञ ही हैं। इसका तात्पर्य है कि हमने यज्ञ को पूरा कर लिया या हमने यज्ञ को प्राप्त कर लिया। अब कहता है-'अग्ने त्व', सूक्तवागस्युपश्रुति दिवस्पृथिव्योः ।" इसका तात्पर्य है कि —"अग्नि ! तू सूक्तवाक् है और द्यौ तथा पृथिवी उसको सुनते हैं।" अब कहता है— "ओ मन्वती तेऽस्मिन् यज्ञे यजमान द्यावापृथिवी स्ताम्"—'हे यजमान ! इम यज्ञ में द्यौ और पृथिवी तेरे लिए कल्याणकारी होवें।" इसका तात्पर्य यह है कि "हे यजमान, इस यज्ञ में द्यौ और पृथिवी तेरे लिए अन्नवती (अन्न को देनेवाली) होवें" ॥४॥ अब कहता है—"शंगवी जीवदानू ।" इसका तात्पर्य यह है कि वे दोनों पशुओं के लिए हितकारी और जीवन को बढ़ानेवाले हैं । अब कहा—"अत्रस्नूऽअप्रवेदेन"—"डरनेवाले और समझ में न आनेवाले।" इसके कहने से तात्पर्य यह है कि तू किसी से न डरे और तेरे इस धन को तुमसे कोई न ले ॥५॥ अब कहा— "उरुगव्यूतीऽअभयङ् कृतौ"—"विशाल घरवाले और अभय पानेवाले ।" इससे तात्पर्य है कि उनके घर विशाल हों और वे भय से मुक्त हों । अब कहा-'वृष्ट्यावारी- त्यापा' यह इसलिए कहा कि वे दोनों वर्षावाले हों ॥६॥ अब कहा--'शम्भूवो मयोभूवौ ।' यह इसलिए कहा कि वे दोनों कल्याण करनेवाले और दान देनेवाले हों। अब कहा-'ऊर्जस्वती च पयस्वती च ।' इसके कहने से तात्पर्य यह है कि वे दोनों रसवाले और जीविका देनेवाले हों ॥७॥ अब कहा, 'सूपचरण च स्वाधिचरण ।' 'सूपचरण।' इसलिए कहा कि द्यौ जिसको तू नीचे