भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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का० १, अ० ६, ब्रा० १, कं० ८-१६ शतपथब्राह्मण / १७५ से छूता है तुझे सुगमता से प्राप्त हो जाय। 'स्वधिचरणा' इसलिये कहा कि यह पृथिवी जिस पर तू रहता है तुझे स्थान दे । अब कहा—"तयोराविदि"—"उन दोनों के ज्ञान से ।" इससे तात्पर्य है कि 'उन दोनों की अनुमति से' ॥८॥ अब कहा—"अग्निरिदं हविर्जुषतावीवृधत महो ज्यायोऽकृत ।"—"अग्नि ने इस हवि को ले लिया । वह बढ़ गया । वह बड़ा हो गया ।" इससे अग्नि के याज्य की ओर संकेत है। अब कहा —"सोम इदं हविर्जुषतावीवृधत महो ज्यायोऽकृत ।"—"सोम ने इस हवि को ले लिया। वह बढ़ गया । वह बड़ा हो गया ।" इससे सोम के आज्य की ओर संकेत है। अब कहा—"अग्निरिदं हविर्जुषतावीवृधत महो ज्यायोऽकृत ।"—"अग्नि ने यह हवि ले ली। वह बढ़ गया । वह बड़ा हो गया।" इससे अग्नि के पुरोडाश से तात्पर्य है जो दर्श और पूर्णमास दोनों यज्ञों में अवश्य ही दिया जाता है ॥६॥ इसी प्रकार अन्य देवों के लिए। "देवा आज्यपा आज्यमजुषन्तावीवृधन्त महो ज्यायो- ऽकृत ।"—"आज्य या घी को पीनेवाले देवों ने आज्य को ले लिया । वे बढ़ गये । वे बड़े हो गये।" यहाँ प्रयाज और अनुयाजों से तात्पर्य है क्योंकि प्रयाज और अनुयाज ही आज्य पान करनेवाले देव हैं। अब कहा—"अग्निर्होत्रेणेदं हविर्जुषतावीवृधत महो ज्यायोऽकृत ।"—"होत्र अग्नि ने इस हवि को लिया। वह बढ़ गया। वह बड़ा हो गया।" यहाँ 'होत्र अग्नि' के लिए कहा। 'जुषता' अर्थात् स्वीकार कर लिया। ऐसा कहकर वह जो देवता इष्ट होते हैं उनको गिनाता है कि इस देव ने हवि स्वीकार की। इस प्रकार यज्ञ की समृद्धि को चाहता है, क्योंकि जो कुछ हवि देवता स्वीकार करते हैं उसी से उसको बड़ी चीजों की प्राप्ति होती है। इसलिए कहा कि 'स्वीकार किया'। 'बढ़ गये' इसलिए कहा कि जब देव हवि स्वीकार करते हैं तो पहाड़-से बढ़ जाते हैं। इसलिये कहता है—'बढ़ गये' । 'बड़े हो गये' इसलिए कहा कि यज्ञ ही देवों का बड़प्पन है। इसी को वे बड़ा करते हैं। इसलिए कहा 'बड़े हो गये' ॥११॥ अब कहा—"अस्यामृद्धेद्धोत्रायां देवङ्गमायाम् ।"—"इस देवों के पास जानेवाले होत्र में वृद्धि को प्राप्त हो।" उसके कहने से तात्पर्य यह है कि इस देवों के पास जानेवाले होत्र में फूले- फले। अब कहा—"आशास्तेऽयं यजमानोऽसौ ।"—"यह यजमान प्रार्थना करता है।" यहाँ ('असौ' के स्थान में) यजमान का नाम लेता है। इस प्रकार प्रत्यक्ष रूप से उसके लिए आशीर्वाद का सम्पादन करता है ॥१२॥ अब कहा—"दीर्घायुत्वमाशास्ते ।"—"बड़े जीवन के लिए प्रार्थना करता है।" जिसको पहले (इडा में) 'देवयज्या' कहा उसी को यहाँ 'दीर्घायु' कहता है ॥१३॥ अब कहा—"सुप्रजास्त्वमाशास्ते ।"—"अच्छी सन्तान के लिए प्रार्थना करता है।" वहाँ पहले 'भूयो हविष्करण' कहा, यहाँ उसी को 'सुप्रजास्त्वं' कहा। जो इस प्रकार करेगा उसे शासन प्राप्त होगा। उसको कहना चाहिए—"देवयज्यामाशास्ते।"—"देवयज्या के लिए प्रार्थना करता है।" इससे दीर्घायु, प्रजा और पशु की प्राप्ति होगी ॥१४॥ अब कहा—"भूयो हविष्करणमाशास्ते ।"—"बहुत हविष्करण की प्रार्थना करता है।" इससे उसी की प्रार्थना करता है। अब कहा—"सजातवनस्यामाशास्ते ।"—"अपने साथियों के लिए प्रार्थना करता है।" प्राण ही 'सजाता' हैं क्योंकि ये साथ उत्पन्न होते हैं। इसलिए प्राणों के लिए प्रार्थना करता है ॥१५॥ अब कहा—"दिव्यं धामाशास्ते ।"—"दिव्य धाम की प्रार्थना करता है।" जो यज्ञ करता है वह इसलिए करता है कि देवलोक में भी मेरे लिए धाम मिले। इस प्रकार वह देवलोक में भी हिस्सेदार करता है। अब कहता है—"यदेनेन हविषाशास्ते तदश्यात् तदृध्यात् ।" अर्थात् "इस