भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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कां० १, अ० ६, ब्रा० १, कं० १६-२६ शतपथब्राह्मण / १७७ हवि से जो प्रार्थना करे वह सब प्राप्त हो जाय” ॥१६॥ ये पाँच आशिषें देता है। तीन इडा में हुईं। इस प्रकार आठ हुईं। गायत्री में आठ अक्षर होते हैं। गायत्री वीर्य है। इसलिए वीर्य का सम्पादन करता है ॥१७॥ इनसे अधिक (आशीष) न दे। यदि इनसे अधिक दे तो सीमा से बाहर जाय, और यज्ञ में जो सीमा से बाहर जाता है वह दुष्ट शत्रु के लिए होता है। इसलिए सीमा से बाहर न जाय ॥१८॥ इनसे कम कर सकता है जैसे सात। ‘तदस्मै देवा रासन्ताम् ।’ ऐसा कहने से अर्थ यह है कि ‘उसके लिए देव इस पदार्थ को दें।’ ‘तदग्निर्देवो देवेभ्यो वनुतां वयमग्नेः परिमानुषा ।’ इसका अर्थ है कि ‘अग्निदेव देवों से लेवे और हम तब इस (यजमान) के लिए इसे ले लेवें’ ॥१९॥ ‘इष्टं च वित्तं च ।’—‘चाहा और प्राप्त किया।’ उन्होंने यज्ञ को चाहा और प्राप्त किया। इसलिए कहा ‘इष्टं च वित्तं च ।’ अब कहा—‘‘उभे चैनं द्यावापृथिवीऽअँहसस्पा- ताम् ।’’ अर्थात् ‘द्यौ और पृथिवी दोनों इसको पाप से बचावें’ ॥२०॥ कुछ लोग कहते हैं ‘उभे च मा’—‘दोनों मुझको भी।’ अर्थात् होता आशीष में अपने को भी शामिल कर लेता है। लेकिन ऐसा न कहना चाहिए, क्योंकि यज्ञ में आशीष तो यजमान के लिए है (उसमें ऋत्विजों से क्या प्रयोजन ?)। यज्ञ में ऋत्विज लोग जो कुछ आशीष देते हैं वह सब यजमान के लिए ही होती है। इसके अतिरिक्त जो कोई कहे ‘मुझको भी’, वह आशीर्वाद को कहीं भी स्थापित नहीं करता, इसलिए कहना चाहिए कि ‘ये दोनों उसको बचावें’ ॥२१॥ अब कहता है—‘‘इह गतिर्वामस्य !’’—‘‘यह वाम (इष्ट पदार्थ) की गति है।’’ यज्ञ में जो कुछ अच्छा है उसको वह इस प्रकार यजमान के लिए दे देता है। इसलिए कहा ‘यह वाम की गति है’ ॥२२॥ अब कहा—‘‘इदं च नमो देवेभ्यः ।’’—‘‘यह देवों के लिए नमस्कार हो।’’ यज्ञ समाप्त होने पर देवों को नमस्कार करता है, इसलिए कहता है ‘यह देवों के लिए नमस्कार हो’ ॥२३॥ अब कहता है—‘‘शंयोः’’—‘‘कल्याण हो।’’ बृहस्पति के पुत्र शंयु ने यज्ञ की संस्था को पहले जाना। वह देवलोक को भाग लेने चला गया। उस पर वह ज्ञान मनुष्यों से लोप हो गया ॥२४॥ अब ऋषियों को पता लगा कि बृहस्पति का पुत्र शंयु यज्ञ की संस्था को जानकर देवलोक में भाग लेने चला। ‘शंयोः’ का उच्चारण करके उन (ऋषियों) ने भी यज्ञ की उस संस्था को जान लिया जिसे बृहस्पति के पुत्र शंयु ने जाना था। यह (होता) भी शंयोः के उच्चारण से यज्ञ की उस संस्था को समझ लेता है जिसे बृहस्पति के पुत्र शंयु ने जाना था। इसलिए वह कहता है ‘शंयोः’ ॥२५॥ अब कहता है—‘‘तच्छंयोरावृणीमहे ।’’—‘‘उस शंयोः को हम धारण करें।’’ अर्थात् हम