भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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कां० १, अ० ६, ब्रा० २, कं० १६-२८ शतपथब्राह्मण / १८३ लेता है ॥१६॥ वह उनको अग्नि के लिए उठाता है (यह मन्त्र पढ़कर) “अग्नेऽदब्धायोऽशीतम” (यजु० २।२०) – “हे शक्तिवाले और दूर जानेवाले अग्नि ।” चूंकि अग्नि ‘अमर’ है इसलिए कहा- ‘अदब्धायो ।’ अग्नि बहुत दूर पहुँचता है, (अशिष्ट है) इसलिए ‘अशीतम’ कहा। अब कहता है- “पाहि मा दिद्योः पाहि प्रसित्यै पाहि दुरिष्ट्यै पाहि दुरद्मन्या ।” – “बचा मुझको वज्र से, बचा मुझको बन्धनों से, बचा मुझे दूषित यज्ञ से और बचा मुझे बुरे अन्न से ।” इसका तात्पर्य यह है कि हर प्रकार की बुराइयों से बचा । अब कहता है- “अविषन् नः पितुं कृणु” (यजु० २।२०)– “हमारे अन्न को विषरहित कर” (पितु नाम है अन्न का) । इससे तात्पर्य है कि हमारे अन्न को सर्वथा विषरहित कर । अब कहता है-“सुषदा योनौ”(यजु०२।२०)-“सुख देनेवाली गोद में ।” इसका तात्पर्य है तुझमें । (फिर कहा) ‘स्वाहावाट्’ (यजु० २।२०) । चूंकि वषट्कार किया, इसलिए यह ऐसा ही हो गया ॥२०॥ अब पत्नी वेद (कुशों के गुच्छों को) खोलती है । वेदि स्त्री है, वेद पुरुष है । वेद जोड़े के के लिए बनाया जाता है और इसलिए जब यज्ञ में वह वेदि को (वेद से) छूता है तो सन्तान उत्पन्न करनेवाली सन्धि हो जाती है ॥२१॥ पत्नी वेद को इसलिए खोलती है कि - पत्नी स्त्री है, वेद पुरुष है । इस प्रकार सन्तान उत्पन्न करनेवाली सन्धि हो जाती है । इसलिए पत्नी वेद को खोलती है ॥२२॥ यदि वह यजु० का मन्त्र पढ़कर खोलना चाहे तो इस यजु०को पढ़कर खोले – “वेदोऽसि येन त्वं देव वेद देवेभ्यो वेदोऽभवस्तेन मह्यं वेदो भूयाः” (यजु २।२१) – “तू वेद है हे देव, वेद तू देवों के लिए वेद हो गया । मेरे लिए वेद हो” ॥२३॥ (होता) उसको वेदि तक फैलाता है, क्योंकि वेदि स्त्री है और वेद पुरुष है, पुरुष स्त्री के पास पीछे से जाता है । इसलिए यह पीछे से अर्थात् पश्चिम से पुरुष-वेद को स्त्री-वेदि तक ले जाता है । इसलिए वह वेदि तक फैलाता है ॥२४॥ अब समिष्ट-यजु की आहुति देता है जिससे ‘मेरा यज्ञ पूर्व में समाप्त हो जाय ।’ यदि वह समिष्ट-यजु पहले करता और पत्नी-संयाज पीछे, तो उसका यज्ञ पश्चिम में समाप्त होता । इसलिए वह समिष्ट-यजु की आहुतियां इस समय देता है कि मेरा यज्ञ पूर्व में समाप्त हो ॥२५॥ अब इसका समिष्ट-यजुः नाम क्यों पड़ा ? जो देवता यज्ञ में बुलाये जाते हैं और जिन देवों के लिए यह यज्ञ किया जाता है, वे सब समिष्ट होते हैं (सम् + इष्टा) चाहे हुए या बुलाये हुए । उन सब समिष्टों में जो आहुति दी जाती है उसका नाम है समिष्ट-यजुः । (यजुः का अर्थ है आहुति) ॥२६॥ अब समिष्ट-यजुः क्यों किया जाता है ? जिन देवताओं को वह इस यज्ञ द्वारा बुलाता है और जिन देवताओं के लिए यह यज्ञ किया जाता है, वे देवता ठहरे रहते हैं, जब तक कि समिष्ट- यजुः न हो, यह सोचते हुए कि हमारे लिए यह आहुतियां देगा । उन्हीं देवताओं का वह यथाविधि विसर्जन कर देता है; और जिस विधि के अनुसार उसने यज्ञ को उत्पन्न किया और फैलाया, उसी को उत्पन्न करके उसको प्रतिष्ठा में स्थापित करता है । इसलिए वह समिष्ट-यजुः की आहुति देता है ॥२७॥ वह यह मन्त्रांश पढ़कर आहुति देता है - “देवा गातुविदः” (यजु० २।२१) – “मार्ग