भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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कां० १, अ० ६, ब्रा० २, क० २८-३५ शतपथब्राह्मण / १८५ को पानेवाले देव ।” वस्तुतः देव मार्ग को पानेवाले हैं। “गातुं वित्त्वा” (यजु० २।२१)-“मार्ग को पाकर ।” इसका तात्पर्य है 'यज्ञ को पाकर' । “गातुवित्” (यजु० २।२१)— “मार्ग पर चलो ।” इससे वह यथाविधि (देवों का) विसर्जन करता है । अब कहता है- “मनसस्पतऽइमं देव यज्ञं स्वाहा वाते धाः” (यजु० २।२१) — “हे मन के पति ! इस देवयज्ञ को वायु में रख । स्वाहा ।” यह यज्ञ ही है जो बहता है अर्थात् पवन । इस प्रकार इस यज्ञ को तैयार करके उस यज्ञ (दर्श- पूर्णमास) में स्थापित करता है । यज्ञ को यज्ञ से मिलाता है, इसलिए कहा 'स्वाहा वाते धाः' ।।२८।। अब बर्हि-यज्ञ करता है । यह लोक ही बर्हि है। ओषधियाँ बर्हि हैं। इस विधि से वह इस लोक में ओषधियाँ धारण करता है, और ये ओषधियां इस लोक में प्रतिष्ठित हैं। इसलिए बर्हि-यज्ञ करता है ।।२९।। यह एक अतिरिक्त आहुति है । समिष्ट-यजुः यज्ञ का अन्त है । जो समिष्ट-यजुः से ऊपर है वह अतिरिक्त आहुति है । जब समिष्ट-यजुः करता है तो इन देवताओं के लिए करता है, इसी से ये अनन्त और असीमित ओषधियां होती हैं ।।३०।। यह आहुति इस मन्त्र से दी जाती है-“सं बर्हिरङ्क्तां हविषा घृतेन समादित्यैर्वसुभिः सम्मरुद्भिः । समिन्द्रो विश्वेदेवेभिरङ्क्तां दिव्यं नभो गच्छतु यत् स्वाहा” (यजु० २।२२)— “बर्हि हवि और घी से युक्त हों । इन्द्र आदित्यों, वसुओं, रुद्रों और विश्वेदेवों से संयुक्त हो । जो स्वाहा अर्थात् आहुति दी गई है यह दिव्य आकाश को जाये” ।।३१।। अब दक्षिण की ओर जाकर प्रणीता पात्र के जल को डालता है, अथवा जब यज्ञ को करता है तो उसको जोतता है । यदि प्रणीता के जल को न डालेगा तो न छोड़ा हुआ (न खोला हुआ) यज्ञ पीछे को हटकर यजमान को हानि पहुँचावेगा । इस प्रकार यज्ञ यजमान को हानि नहीं पहुंचाता । इसलिए प्रणीता का जल दक्षिण की ओर जाकर डालता है ।।३२।। वह इस मन्त्र को पढ़कर डालता है- “कस्त्वा विमुञ्चति, स त्वा विमुञ्चति । कस्मै त्वा विमुञ्चति, तस्मै त्वा विमुञ्चति । पोषाय” (यजु० २।२३) - “कौन तुझे खोलता है ? वह तुझे खोलता है । किसके लिए तुझको खोलता है ? उसके लिए तुझको खोलता है । पुष्टि के लिए ।” इससे वह उत्तम पुष्टि को यजमान के लिए मांगता है। जिस पात्र के द्वारा जल लिया था उसी के द्वारा डालता है । क्योंकि जिससे वे (घोड़ों को या बैलों को) जोतते हैं उसीसे खोलते हैं । योक्त्र अर्थात् जुए की रस्सी से जोतते हैं और उसी से खोलते हैं । फलीकरण अर्थात् चावलों का कूड़ा कपाल के द्वारा कृष्णाजिन (हिरन के चमड़े) के नीचे फेंक देता है, यह कहकर - "रक्षसां भागोऽसि” (यजु० २।२३) — “राक्षसों का भाग है तू” ।।३३।। देव और असुर दोनों प्रजापति की सन्तान इस यज्ञ, प्रजापति, पिता अर्थात् संवत्सर के लिए झगड़ा करते थे कि 'यह हमारा होगा, यह हमारा होगा' ।।३४।। अब देवों ने सब यज्ञ पर स्वत्व कर लिया। जो यज्ञ का बुरा भाग था वह उन असुरों क दे दिया, जैसे (यज्ञ के) पशु का रक्त और हविर्यज्ञ के चावल की भूसी । उन्होंने कहा- 'इनको यज्ञ का कोई भाग न मिले ।” क्योंकि जिसको यज्ञ का बुरा भाग मिलता है वह न मिलने के ही बराबर है, और जिसको कुछ भी नहीं मिलता उसे कुछ आशा होती है और कहता है - 'तूने मुझको कौन-सा भाग दिया है ?' इसलिए जो भाग देवों ने असुरों के लिए रक्खा था, वही भाग