भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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कां० १, अ० ६, ब्रा० ३, क० ६-१६ शतपथब्राह्मण / १८६ को, दूसरे से अन्तरिक्ष को, तीसरे से द्यौ को। यह विष्णु-यज्ञ यजमान के लिए इस शक्ति को प्राप्त करा देता है। इसीलिए विष्णु के पगों को चलता है। अब इसी (पृथिवी) से बहुत-से (ऊपर को) चलते हैं ॥६॥ वह इस मन्त्र से-“पृथिव्यां विष्ण॒व्य॑क्रꣳस्त गायत्रेण च्छन्दसा ततो निर्भक्तो योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः” (यजु० २।२५), “अन्तरिक्षे विष्ण॒व्य॑क्रꣳस्त त्रैष्टुभेन च्छन्दसा ततो निर्भक्तो योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः”(यजु० २।२५), “दिवि विष्ण॒व्य॑क्रꣳस्त जागतेन च्छन्दसा ततो निर्भक्तो योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः” (यजु० २।२५) – “पृथिवी में विष्णु गायत्री छन्द से चला। जो हमसे द्वेष करता है या जिससे हम द्वेष करते हैं, वह यहाँ से बहिष्कृत है”, “अन्तरिक्ष में विष्णु त्रिष्टुभ् छन्द से चला। जो हमसे द्वेष करता है या जिससे हम द्वेष करते हैं, वह यहाँ से बहिष्कृत है”, “द्यौ लोक में विष्णु जगती छन्द से चला। जो हमसे द्वेष करते हैं या जिससे हम द्वेष करते हैं, वह यहाँ से बहिष्कृत है।” जब इन लोगों को प्राप्त हो गया तो यही गति है, यही प्रतिष्ठा है। जो यह तपता है अर्थात् सूर्य, उसकी ये किरणें हैं वे सुकृत हैं। यह जो परम-प्रकाश है वह प्रजापति या स्वर्ग-लोक है। इस प्रकार इन लोकों को प्राप्त होता है। वह इस गति और प्रतिष्ठा को पाता है। जो अनुशासन या उपदेश देना चाहे वह ऊपर से नीचे आता है। दो कारण हैं कि वह ऊपर से नीचे आता है—॥१०॥ (शत्रु के) भागने पर विजयी देवों ने पहले द्यौ को जीता, फिर अन्तरिक्ष को, फिर उन शत्रुओं को इस (पृथिवी) से भी निकाला जहाँ से भाग जाना कठिन था। उसी प्रकार यह (होता) भी (शत्रुओं के) भागने पर पहले द्यौ लोक को जीतता है, फिर अन्तरिक्ष को, फिर उनको इस (पृथिवी) से निकालता है जहाँ से भाग जाना नहीं बन सकता। यह पृथिवी की प्रतिष्ठा है इसलिए वह इस प्रतिष्ठा में ही प्रतिष्ठित होता है ॥११॥ और इस प्रकार भी-“दिविविष्ण॒व्य॑क्रꣳस्त । जागतेन च्छन्दसा ततो निर्भक्तो योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मोऽन्तरिक्षे विष्ण॒व्य॑क्रꣳस्त त्रैष्टुभेन च्छन्दसा ततो निर्भक्तो योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः पृथिव्यां विष्ण॒व्य॑क्रꣳस्त गायत्रेण च्छन्दसा ततो निर्भक्तो योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मोऽस्मादन्नादान्द्यं प्रतिष्ठाया” (यजु० २।२५) – “द्यौ लोक में विष्णु जगती छन्द से चला। वहाँ से वह निकाल दिया गया जो हमसे द्वेष करता है या जिससे हम द्वेष करते हैं। अन्तरिक्ष में विष्णु त्रिष्टुभ छन्द से चला। वहाँ से वह निकाल दिया गया जो हमसे द्वेष करता है या जिससे हम द्वेष करते हैं। पृथिवी में विष्णु गायत्री छन्द से चला। वहाँ से वह निकाल दिया गया जो हमसे द्वेष करता है या जिससे हम द्वेष करते हैं। इस अन्न से और प्रतिष्ठा से (निकाल दिया गया)।” इस पृथिवी में ही सब अन्न आदि प्रतिष्ठित हैं इसीलिए कहा, 'इस अन्न से और इस प्रतिष्ठा से' ॥१२॥ अब वह पूर्व की ओर देखता है। पूर्व देवों का दिशा है। इसलिए पूर्व की ओर देखता है ॥१३॥ वह यह मन्त्र पढ़कर देखता है-“अग्न्म॒ स्वः”(यजु० २।२५) - “हम स्वर्ग को पहुँच गये।” देव ही स्वर्ग हैं इसलिए तात्पर्य है 'देवों को प्राप्त हो गये।' अब कहता है-“सं ज्योतिषा- भूम” (यजु० २।२५) -- “प्रकाश से हम मिल गये।” इससे तात्पर्य है कि हम देवों से मिल गये ॥१४॥ अब वह सूर्य की ओर देखता है, क्योंकि वही गति है, वही प्रतिष्ठा है। इस गति को और प्रतिष्ठा को प्राप्त होता है, इसलिए सूर्य की ओर देखता है ॥१५॥ वह इस मन्त्र को पढ़कर देखता है- “स्वयम्भूरसि श्रेष्ठो रश्मिः”(यजु०२।२६) – “हे श्रेष्ठ किरण ! तू स्वयम्भू है।” सूर्य श्रेष्ठ किरण है इसलिए कहा, 'हे श्रेष्ठ किरण, तू स्वयम्भू है।'