शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 209, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंकां० १, अ० ९, ब्रा० ३, कं० १६-२३ शतपथब्राह्मणम् / १६१ अब कहता है—‘‘वर्चोदाऽसि वर्चो मे देहि’’ (यजु० २।२६)—‘‘तू तेज देनेवाला है, तू तेज दे।’’ याज्ञवल्क्य ने कहा, ‘मैं यही कहता हूँ कि ब्राह्मण यह चाहे कि मैं ब्रह्मवर्चसी होऊँ।’ औपदितेय ने कहा, ‘वह मुझे गायें देगा। इसलिए मैं कहता हूँ, तू गाय देनेवाला है मुझे गाय दे।’ इस प्रकार (यजमान) जो चाहता है वही उसको मिल जाता है ॥१६॥ अब वह (बाईं ओर से दाहिनी ओर को) मुड़ता है यह पढ़कर—‘‘सूर्यस्यावृतमन्वावर्ते’’ (यजु०२।२६)—‘‘मैं सूर्य के मार्ग को लौटता हूँ।’’ इस गति और प्रतिष्ठा को प्राप्त होकर वह लौटता है ॥१७॥ अब वह गार्हपत्य अग्नि के पास जाता है। गार्हपत्य घर है। घर ही प्रतिष्ठा है इसलिए वह घर में अर्थात् प्रतिष्ठा में ठहरता है और दूसरे, जो मनुष्य की पूरी आयु हो सकती है उसको प्राप्त करता है। इसलिए गार्हपत्य अग्नि के पास ठहरता है ॥१८॥ वह यह मन्त्र पढ़कर जाता है—‘‘अग्ने गृहपते सुगृहपतिस्त्वयाऽग्नेऽहं गृहपतिना भूयासँ॒ सुगृहपतिस्त्वम् मयाऽग्ने गृहपतिना भूयाः’’(यजु०२।२७)—‘‘हे गृहपति अग्नि ! मैं तुझ गृहपति की सहायता से अच्छा गृहपति हो जाऊँ। हे अग्नि ! मुझ गृहपति की सहायता से तू अच्छा गृहपति हो जा।’’ यह स्पष्ट ही है। अब कहता है —‘‘अस्थूरि णौ गार्हपत्यानि सन्तु’’ (यजु० २।२७) —‘‘हमारे घर के मामले एक बैल की गाड़ी जैसे न हों।’’ इस कहने का तात्पर्य है कि हमारे घर के मामले दुःख-रहित हों। अब कहता है—‘‘शतं॒ हिमाः’’ (यजु० २।२७)—‘‘सौ वर्ष तक।’’ इसका तात्पर्य है ‘मैं सौ वर्ष तक जीऊँ।’ परन्तु उसको ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि मनुष्य सौ वर्ष से अधिक जीता है। इसलिए उसको ऐसा नहीं कहना चाहिए ॥१९॥ अब वह (बाईं ओर से दाईं ओर) मुड़ता है यह पढ़कर —‘‘सूर्यस्यावृतमन्वावर्ते’’ (यजु० २।२७)—‘‘सूर्य के मार्ग से लौटता हूँ।’’ वह इस गति और प्रतिष्ठा को प्राप्त करके इस (सूर्य के) मार्ग से लौटता है ॥२०॥ अब (यह मन्त्र पढ़ता हुआ) अपने पुत्र का नाम लेता है—‘‘इदं मेऽयं वीर्यं पुत्रोऽनुसन्तन्- वत्’’—‘‘मेरा पुत्र मेरे इस वीर्य को जारी रखे।’’ यदि पुत्र न हो तो अपना ही नाम ले ॥२१॥ अब आहवनीय के पास खड़ा होता है। वह चुपके से खड़ा होता है यह जानकर कि पूर्व में मेरा यज्ञ समाप्त होगा ॥२२॥ अब व्रत का विसर्जन करता है (यह मन्त्र पढ़कर)—‘‘इदमहं यऽएवाऽस्मि सोऽस्मि’’ (यजु०२।२८)—‘‘यह मैं वहीं हूँ जो हूँ।’’ जब व्रत को किया था तो मनुष्य से ऊपर (देव) हो गया था। अब यह कहना तो उचित नहीं है कि मैं सच से झूठ को प्राप्त होऊँ; और वह मनुष्य हो ही जाता है, इसलिए उसको इस मन्त्र को पढ़कर ही व्रत का विसर्जन करना चाहिए-‘मैं वही हूँ जो हूँ।’ (यजु० २।२८) ॥२३॥ माध्यन्दिनीय शतपथब्राह्मण की श्रीमत् पण्डित गंगाप्रसाद उपाध्याय कृत ‘रत्नकुमारी-दीपिका’ भाषा व्याख्या का हविर्यज्ञनाम प्रथम काण्ड समाप्त हुआ। प्रथम काण्ड प्रपाठक कण्डिका-संख्या प्रथम [ १.२.२ ] १२१ द्वितीय [ १.३.३ ] १२२ तृतीय [ १.४.४ ] १२८ चतुर्थ [ १.६.१ ] १२१ पंचम [ १.७.२ ] १२१ षष्ठ [ १.८.२ ] १११ सप्तम [ १.६.३ ] ११४ योग ८३८