शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 241, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंकां० २, अ० २, ब्रा० ३, कं० १६-२७ शतपथब्राह्मण / २२३ घी को ग्रहण करे। वौषट् ।" (आ) "अग्निमाज्यस्य वेतु वौषट् ।" "(तनूनपात्) आज्य की अग्नि को स्वीकार करे। वौषक्।" (इ) "अग्निनाज्यस्य व्यन्तु वौषक् ।"— "वे (इडा) अग्नि के द्वारा आज्य को स्वीकार करें, वौषक् ।" (ई) "अग्निराज्यस्य वेतु वौषक्"-'अग्नि आज्य को स्वीकार करे, वौषक्" ।।१६।। अब कहता है— 'स्वाहाग्निम्'—आग्नेय आज्य भाग के लिए। यदि पवमान के लिए आधान करे तो कहे 'स्वाहाग्निं पवमानम्', यदि इन्दुमान् अग्नि के लिए आधान करें तो कहे, 'स्वाहाग्निमिन्दुमन्तम्' । 'स्वाहाग्निम्', 'स्वाहाग्नीनाज्यपान् जुषाणोऽग्निराज्यस्य वेतु ।' यह (होता) पढ़ता है ॥२०॥ आग्नेय आज्य भाग के सम्बन्ध में (अध्वर्यु) कहता है, "अग्नयेऽनुब्रूहि"— "अग्नि के लिए पढ़ो।" तब (होता) पढ़ता है- "अग्निं स्तोमेन बोधय, समिधानोऽमर्त्यम् । हव्या देवेषु नो दधत् ।"- "स्तुति द्वारा अग्नि को जगाओ जो अमरत्व को प्रज्वलित करता है, जिससे यह अग्नि हमारे हवियों को देवताओं तक ले जावे।" जब अग्नि अपने स्थान से निकाला जाता है तो सोता-सा है। अब (ऋत्विज्) उसको जगाता है। अब वह पढ़ता है- "जुषाणोऽग्निराज्यस्य वेतु" अर्थात् "अग्नि कृपा करके आज्य को ग्रहण करे" ।।२१।। यदि अग्नि-पवमान के लिए आधान करना हो तो कहे "अग्नये पवमानाय अनुब्रूहि" अर्थात् "पवमान अग्नि की स्तुति करो।" तब होता पढ़े— "अग्नऽआयु॑ षि पवसऽआसुवोर्ज॒मिषं च नः । आरे बाधस्व दुच्छुनाम्" (ऋग्वेद ६।६६।१६)—"हे अग्नि ! तू आयु को (उम्रों को) फूँकती है। हमारे लिए अन्न और रस उत्पन्न करो। विपत्तियों को हमसे दूर करो।" इस प्रकार यह अग्नि-युक्त हो जाता है। सोम पवमान है। परन्तु इसको वह सोम के आज्य भाग से निकालते हैं। अब वह पढ़ता है— "जुषाणोऽग्निः पवमान आज्यस्य वेतु ।"— "अग्नि पवमान प्रसन्न होकर आज्य को स्वीकार करे" ।।२२।। यदि वह इन्दुमान् अग्नि के लिए आधान करे तो कहता है— "अग्नयेऽइन्दुमतेऽनुब्रूहि ।" "इन्दुमान् अग्नि के लिए प्रार्थना करो।" तब होता पढ़े- "एह्यषु ब्रवाणि तेऽग्ने इत्येतरा गिरः। एभिर्वर्धास इन्दुभिः" (ऋग्वेद ६।१६।१६)-'हे अग्नि, आ। मैं और प्रार्थनायें तेरे लिए कहूँगा। इन इन्दुओँ (बूँदों) से बढ़।" इस प्रकार वह अग्नि का सम्बन्धी हो जाता है। सोम ही इन्दु है। सोम आज्य भाग से लाते हैं। इसलिए पढ़ता है-"जुषाणोऽग्निरिन्दुमानाज्यस्य वेतु।"-"अग्नि इन्दुमान प्रसन्न होकर आज्य को स्वीकार करे।" इस प्रकार वह इन सब को अग्नि-युक्त कर देता है ।।२३।। अब वह हवियों के विषय में कहता है— 'अग्नयेऽनुब्रूहि।' अर्थात् अग्नि की प्रार्थना करो। 'अग्निं यज' अर्थात् अग्नि को पूजो। 'अग्नये स्विष्टकृतेऽनुब्रूहि।' अर्थात् स्विष्टकृत् की प्रार्थना करो। 'अग्निं स्विष्टकृतं यज।' अर्थात् अग्नि स्विष्टकृत् को पूजो। फिर कहे 'देवान् यज ।'—देवों को पूजो। 'अग्नीन् यज ।'—अग्नियों को पूजो ॥२४॥ अब वह प्रार्थना करता है-"अग्नेर्वसुवने वसुधेयस्य वेतु, वौषक् ।"— "(बर्हि) अग्नि की वृद्धि के लिए वसुधा को ग्रहण करे, वौषक् ।"—"अग्नाऽऽड वसुवने वसुधेयस्य वेतु वौषक् ।" " (नराशंस) अग्नि में वृद्धि के लिए वसुधा को स्वीकार करे, वौषक् ।" "देवोऽअग्निः स्विष्टकृत् ।" अर्थात् देव स्विष्टकृत् अग्नि।" यह तीसरी प्रार्थना स्वयं अग्नि की ही है। इस प्रकार सब अनु- याजों को अग्नि का कर देता है ॥२५॥ ये छः विभक्तियाँ हैं— चार प्रयाज में और दो अनुयाजों में। छः ऋतुएँ हैं। (अग्नि) ऋतुओं में प्रविष्ट हुआ था। इस प्रकार ऋतुओं से ही उनका निर्माण करता है ॥२६॥ (इन छः विभक्तियों में) बारह या तेरह अक्षर होते हैं। वर्ष में बारह या तेरह महीने होते हैं। अग्नि ऋतुओं अर्थात् वर्ष में प्रविष्ट हुआ था। इस प्रकार ऋतुओं में अर्थात् संवत्सर से उसका निर्माण करता है। दुहराने के दोष से बचने के लिए दो एक-से नहीं होते। यदि दो एक-से हों तो दुहराने का दोष लगे। इसलिए प्रयाजों में कहते हैं 'व्यन्तु' या 'वेतु', और अनुयाजों में