भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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कां० २, अ० ३, ब्रा० ४, कं० २६-३७ शतपथब्राह्मण / २५५ ३।२३) — "यज्ञों के प्रकाशित करनेवाले, ऋत के चमकानेवाले रक्षक, अपने घर में बढ़नेवाले तुझको।" इसका तात्पर्य है कि यह मेरा घर तेरा ही घर है। इसको हमारे लिए समृद्धि-शील कर ॥२६॥ अब कहा, "स नः पितेव सूनवेऽग्ने सूपायनो भव । सचस्वा नः स्वस्तये" (यजु० ३।२४) "हे अग्नि, तू हमारे लिए उसी प्रकार सुलभ हो जैसे पिता पुत्र को । और हमारी स्वस्ति कर।" इसका तात्पर्य है कि जैसे पिता पुत्र के लिए सुलभ होता है और किसी प्रकार उसको हानि नहीं पहुँचाता, इसी प्रकार तू भी हमारे लिए सुलभ हो, किसी प्रकार हानि न पहुँचा ॥३०॥ अब वह दो पदवाले मन्त्र को पढ़ता है, 'अग्ने त्वं नोऽअन्तमऽउत त्राता शिवो भवा वरूथ्यः । वसुर्गनिर्वसुश्रवाऽअच्छा नक्षि द्युमत्तमँ रयिं दाः' (यजु० ३।२५) — "तं त्वा शोचिष्ठ दीदिवः सुम्नाय नूनमीमहे सखिभ्यः । स नो बोधि श्रुधी हवमुरुष्या णोऽअघायतः समस्मात्" (यजु० ३।२६) — "हे अग्नि ! तू मेरे निकट रह । रक्षक, कल्याणकारी और घर का हितकर हो । हे अग्नि, तुम वसु (धन) हो, वसुश्रवा अर्थात् धन देने के लिए प्रसिद्ध हो । हमको अच्छा-अच्छा चमकदार धन दो" (यजु० ३।२५) — "अपने मित्रों को सुख के लिए हम तुझ प्रकाशस्वरूप और चमकानेवाले के पास आते हैं। हमारे साथ रह, हमारी बात सुन और हमको पापी शत्रु से बचा" (यजु० ३।२६) ॥३१॥ जब आहवनीय की अर्चना करता है तो पशुओं की याचना करता है, इसलिए ऊँचे-नीचे मन्त्रों को जपता है, क्योंकि पशु भिन्न आकार के होते हैं। जब गार्हपत्य की अर्चना करता है तो पुरुषों की याचना करता है। इसलिए पहली तीन ऋचाएँ गायत्री छन्द में हैं। गायत्री अग्नि.का छन्द है। इसलिए उसी के छन्द से स्तुति करता है ॥३२॥ अब वह (ऊपर के) दो पदवाले मन्त्र जपता है। दो पदवाले मन्त्र पुरुष छन्द हैं, क्योंकि पुरुष भी दो पैरवाला है, इसलिए पुरुषों की याचना करता है। पुरुषों की याचना करता है इसलिए दो पदोंवाले मन्त्र को जपता है। जो इस रहस्य को समझकर (दोनों अग्नियों की) सेवा करता है उसको पशु और पुरुष दोनों प्राप्त होते हैं ॥३३॥ अब वह इस मन्त्र को जपकर गाय के पास जाता है, "इड एह्यदित ऽएहि" (यजुर्वेद ३।२७) — "हे इडा, आ । हे अदिति, आ ।" इडा गौ है। अदिति गौ है। "काम्याऽ एत" अर्थात् "कामना के योग्य तुम आओ" यह कहकर छूता है। इनमें मनुष्यों की कामनाएँ हैं, इसलिए इनको 'काम्या एत' कहा (यजु० ३।२७) । अब कहा—"मयि वः कामधरणं भूयात्" (यजु० ३।२७) —"आपकी मेरे में इच्छा-पूर्ति हो" अर्थात् मैं आपका प्रिय होऊँ, यह तात्पर्य है ॥३४॥ अब आहवनीय और गार्हपत्य के बीच में खड़ा होकर पूर्व को देखकर (इन तीन मन्त्र) को जपता है—'सोमानँ स्वरणं कृणुहि ब्रह्मणस्पते । कक्षीवन्तं यऽ औशिजः ॥ यो रेवान् योऽ अमीवहा वसुवित् पुष्टिवर्धनः । स नः सिषक्तु यस्तुरः ॥ मा नः शँ सोऽअरुषो धूर्तिः प्रणङ् मर्त्यस्य । रक्षा णो ब्रह्मणस्पते" (यजु० ३।२८, २६, ३०) — "हे वाणी के पति, सोम को अर्पण करनेवाले कक्षीवान औशिज को सुरीला कर", "धनवाला, दुःखनाशक, समृद्धिशील और पुष्टि देनेवाला तथा तीव्र, हमारे पास आवे", "हे वाणी के पति ! हमारी रक्षा कर । बुरों का शाप हम तक न आवे और न किसी मनुष्य की धूर्तता" ॥३५॥ जब वह आहवनीय में जाता है तो मानो द्यौलोक में जाता है और जब गार्हपत्य में जाता है तो मानो पृथिवीलोक में, इससे वह अन्तरिक्ष में जाता है। यह बृहस्पति की दिशा है। इस दिशा को प्राप्त होना चाहता है, इसलिए बृहस्पतिवाला मन्त्र जपता है ॥३६॥ अब जपता है, "महि त्रीणामवोऽस्तु द्युक्षं मित्रस्यार्यम्णः । दुराधर्षं वरुणस्य" (यजु० ३।३१) । "नहि तेषाममा चन नाध्वसु वारणेषु । ईशे रिपुरघशँ सः' (यजु० ३।३२) । "ते हि पुत्रासोऽ अदितेः प्र जीवसे मत्र्याय । ज्योतिर्यच्छन्त्यजस्रम्" (यजु० ३।३३) — "बड़ी द्यौलोक सम्बन्धी, न पराजित होनेवाली मित्र, अर्यमा और वरुण तीनों की रक्षा (हमारे लिए) हो," "(इन देवों से रक्षित) लोगों पर भयानक मागों अथवा घरों में पापी शत्रु स्वत्व नहीं प्राप्त कर सकते", "(ये देव) निरन्तर मनुष्य के लिए अदिति के पुत्रों के जीवन के लिए ज्योति देते हैं।"