भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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का० २, अ० ४, ब्रा० १, कं० ५-१४ शतपथब्राह्मण / २५६ "हे प्रशंसनीय, मेरे पशुओं को बचा।" (आहवनीय अग्नि) पशुओं का अधिष्ठाता है, इसलिए पशुओं की रक्षा के लिए (आहवनीय के) सुपुर्द करता है ॥५॥ अब वह चलता है या (किसी यान में बैठकर) रवाना होता है, और जिस किसी सीमा को मान लेता है वहां तक चलकर बोलता है (अर्थात् अब तक मौन था, अब बोलता है)। और जब यात्रा से वापस आता है तो मानी हुई सीमा के भीतर आने पर मौन रहता है और चाहे उस समय घर में राजा भी उपस्थित हो (तो भी उसके पास न जाकर) पहले अग्नि के पास जाता है ॥६॥ पहले आहवनीय के पास और फिर गार्हपत्य के पास जाता है। गार्हपत्य ही घर है और घर ही प्रतिष्ठा का स्थान है। इसलिए वह अपने को घर में अर्थात् प्रतिष्ठा के स्थान में स्थापित करता है ॥७॥ वह इस मन्त्र से आहवनीय में जाता है—"आगन्म विश्ववेदसमस्मभ्यं वसुवित्तमम् । अग्ने सम्राडभि द्युम्नमभि सहऽ आयच्छस्व" (यजु० ३।३८) —"हे सम्राट् अग्नि ! हम तुझ विश्ववेद (सबके जाननेवाले), वसुवित्तम (धन बांटनेवाले) के पास आते हैं। हमको प्रकाश और बल दे।" और तृणों से आग को हाँकता है ॥८॥ इस मन्त्र से गार्हपत्य के पास जाता है—"अयमग्निर्गृहपतिर्गाहपत्यः प्रजाया वसुवित्तमः । अग्ने गृहपतेऽभि द्युम्नमभि सहऽ आयच्छस्व' (यजु० ३।३९) —"गार्हपत्य अग्नि घर का स्वामी और हमारी सन्तान के लिए दान देनेवाला है। हे घर के स्वामी ! अग्नि हमको प्रकाश और बल दे।" अब वह बैठकर तृणों से अग्नि को हाँकता है। इस प्रकार (यजमान) जपकरके अग्नि के पास जाया करते हैं ॥९॥ मौन होकर भी जा सकता है और वह इसलिए—'यदि किसी स्थान में कोई ब्राह्मण राजा या श्रेष्ठ मनुष्य रहता हो तो कोई उससे यह नहीं कह सकता कि मैं यात्रा पर जा रहा हूँ, तुम मेरें माल की रक्षा करना। यहाँ भी श्रेष्ठ अग्नि देवों का निवास हैं। इसलिए इनसे कौन कह सकता है कि आप रक्षा कीजिए, मैं यात्रा को जा रहा हूँ ॥१०॥ देव मनुष्यों के मन को जानते हैं। गार्हपत्य पर अग्नि को मालूम है कि यह अपने को मुझे सौंपने आया है। आहवनीय में भी मौन होकर जावे, क्योंकि आहवनीय को भी मालूम है कि यह अपने को मुझे सौंपने आया है ॥११॥ अब वह पैदल या सवारी में चल पड़ता है और नियत सीमा तक जाने के बाद बोलता है (मौन तोड़ता है)। और जब लौटता है तो जिसको सीमा मान रक्खा है उसको देखते ही मौन धारण कर लेता है, और चाहे भीतर राजा भी क्यों न हो वह उसके पास नहीं जाता ॥१२॥ वह पहले आहवनीय के पास जाता है और फिर गार्हपत्य के पास। आहवनीय के पास मौन होकर जाता है और मौन ही बैठकर तृणों से अग्नि को हाँकता है। गार्हपत्य में भी मौन होकर जाता है और मौन ही बैठकर तृणों से अग्नि को हाँकता है ॥१३॥ अब घर (में आने) के विषय में यह उपचार है। जब कोई गृहपति बाहर से वापस आता है तो घरवाले डर जाते हैं कि यह क्या कहेगा या क्या करेगा। और जब वह कुछ कहता या करता है तो घरवाले डर जाते हैं और उसके कुल में क्षोभ होता है। और जो गृहपति न