भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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भूमिका

वैदिक ऋचाओं के आर्विर्भाव के सहस्रों वर्षों के अनन्तर, ईश्वर, ईश्वरीय सृष्टि, ईश्वरीय ज्ञान और ईश्वरीय व्यवस्था को समझने के लिए आर्यावर्त्त देश के आर्यमनीषियों ने वैदिक वाङ्‌मय का सृजन आरम्भ किया। यह वाङ्‌मय आज भी हमारी परम्परा की अमूल्य धरोहर है। सम्भवतया वैदिक वाङ्‌मय की ऐतिहासिक परम्परा में वेदांगों की रचना सबसे प्राचीन हो। मनुष्य ने परम्परा से ऋचाओं का उच्चारण सीखा हो, और बाद में उसे इस बात का पता चला हो कि वाक् और श्रोत्र के माध्यम से जिस ज्ञान का आदान-प्रदान हो रहा है, वह कुछ मूल ध्वनियों की संहति है जो हमारे वाक्यन्त्र से स्थान-स्थान से, और विशेष प्रयत्नों से प्रसूत होती हैं। यह पहला वेदांग रहा होगा, जिसका अत्यन्त प्राञ्जल रूप हमें पाणिनि की वेदांग "शिक्षा" में उप- लब्ध है। महर्षि पाणिनि की यह रचना अपने विषय की न तो प्रथम रचना है, और न अन्तिम। संसार में आज अनेक वर्णमालाएं हैं, जिनमें स्वरों और व्यञ्जनों के अनेकानेक भेदोपभेद हैं; आज के "शिक्षा-शास्त्री" इनकी ध्वनियों का भी बड़ी सूक्ष्मता से अध्ययन कर रहे हैं। 'शिक्षा' के बाद दूसरे वेदांग का नाम व्याकरण होना चाहिए, और फिर छन्द, क्योंकि ऋचाएँ छन्दोबद्ध थीं। पाणिनि की जो व्याकरण मिलती है वह लौकिक संस्कृत के भी काम की है, और वैदिक के भी काम की, और यही स्थिति पिंगल के छन्दशास्त्र की भी है। संसार के विभिन्न वाङ्‌मयों में व्याकरण और छन्द की विविधता प्रत्येक युग के साथ परिवर्तित और विकसित होती रहेगी। ज्योतिष और कल्प वेदांग भी इसी प्रकार विकासशील हैं। केवल एक वेदांग ऐसा है, जो केवल वेद (चार संहिताओं) के लिए है—वह है यास्क का निघण्टु, और उस ग्रन्थ पर उनकी लिखी टीका निरुक्त। शब्दार्थ समझने में नैरुक्तिक पद्धति के उपयोग का एकमात्र अधिकार हमें ऋग्वेद, और अनुवर्ती वैदिक संहिताओं के क्षेत्र में है, जिनके शब्द आख्याताज, यौगिक और योगरूढ़ि हैं। प्रत्येक तत्त्वज्ञान, दर्शन या विज्ञान की शब्दावली अपने-अपने अर्थों और अभिप्रायों में रूढ़ि हो जाती है। महर्षि दयानन्द के अनुसार आर्यावर्त्त में ब्रह्मा से जैमिनि-पर्यन्त जितना भी साहित्य रचा गया, उसका केन्द्रबिन्दु वेद था। इस वेद को समझने-समझाने के लिए उपांग बने (छह दर्शन- शास्त्र)। चार कोटि के उपवेदों का विकास हुआ, जिनकी कथावस्तु आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद और अर्थवेद कहलाई, और वेद के अभिप्राय से ही प्रातिशाख्यों की रचना हुई। हमारे ब्राह्मण- ग्रन्थ, गृह्यसूत्र, श्रौतसूत्र, आरण्यक और उपनिषदें भी इसी वेद के विस्तार से सम्बन्ध रखती हैं। मनुष्य अपने भीतर एक विशेष मानसयन्त्र लेकर अवतरित हुआ था (अन्य पशुओं के मानस-तन्त्र से, जिसमें उभयेन्द्रियों का तन्त्र भी सम्मिलित है, मनुष्य का मानस-तन्त्र सर्वथा भिन्न रहा है)। जन्मजात कौतूहल, फिर कौतूहल से प्रेरित प्रश्न, और अन्त में प्रश्नों के समाधान का प्रयास, ये तीन क्षमताएँ उसमें सदा रहीं। कौतूहल, प्रश्न (जिज्ञासा) और समाधान—इन तीनों प्रक्रियाओं में उसने तीन विद्याओं को अपनाया—(क) स्वगत, (ख) समष्टिगत, और (ग) परम्परागत। (१) अकेले में विचार, (२) वादों-प्रवचनों और गोष्ठियों में मिलजुलकर विचार, और (३) अन्त