भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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का० २, अ० ५, ब्रा० २, क० ११-२१ शतपथब्राह्मण / २८५ को उसी से सुख पहुँचाता है ॥११॥ उनके ऊपर वे वह शमी वृक्ष के पत्ते भी डालता है। प्रजापति ने प्रजाओं को शमी के वृक्षों से ही शान्त (शं) किया, इसलिये वह प्रजाओं को उसी से शान्त करता है ॥१२॥ अब एक कपाल का पुरोडाश 'क' अर्थात् प्रजापति के लिए होता है। 'क' प्रजापति ने 'क' के लिए एक कपाल के पुरोडाश से प्रजाओं को सुख (क) पहुँचाया। इसी प्रकार यह भी 'क' के लिए एक कपाल के पुरोडाश से प्रजा को सुख (क) पहुँचाता है। इसलिये 'क' (प्रजापति) के लिए एक कपाल का पुरोडाश होता है ॥१३॥ अब यज्ञ के पहले दिन अन्वाहार्य-पचन अर्थात् दक्षिणाग्नि पर जौ की भूसी निकालकर और उनको कुछ पकाकर करम्भ के इतने पात्र बनाते हैं जितने घर के लोग हों और एक अधिक। (करम्भ जौ और दही का बनता है ॥१४॥ वहीं एक मेष और एक मेषी भी बनाते हैं। यदि एडक भेड़ के सिवाय किसी अन्य भेड़ की ऊन मिले तो उस मेष और मेषी को साफ करके उस पर लगा दें। और यदि एडक भेड़ को छोड़कर अन्य की ऊन न मिले तो कुशों का अग्र-भाग ही लगा दें ॥१५॥ यह मेष-मेषी क्यों बनाते हैं? मेष प्रत्यक्ष रूप से वरुण का पशु है। इस प्रकार प्रत्यक्ष ही वरुण के पाश से प्रजा को छुड़ा देता है। उनको जौ का इसलिये बनाते हैं कि जब इन्होंने जौ खाये तभी तो वरुण ने इनको पकड़ा। जोड़ा इसलिए बनाते हैं कि जोड़े से ही प्रजा वरुण के पाश से छूटती है ॥१६॥ उत्तरी पयस्या पर मेषी को रखता है और दक्षिण की पयस्या पर मेष को। क्योंकि इसी प्रकार ठीक जोड़ा मिलता है। क्योंकि स्त्री पुरुष से उत्तर की (बाईं) ओर लेटती है ॥१७॥ अध्वर्यु अन्य सब हवियों को उत्तर की वेदी में रखता है, और प्रतिप्रस्थाता दक्षिण की वेदी में पयस्या को रखता है ॥१८॥ हवियों को रखकर अग्नि का मन्थन करता है। अग्नि को मथकर और वेदी पर लाकर आहुति देता है। पहले अध्वर्यु होता से कहता है—'अग्नये समिध्यमानाम् ।' (जलाई गई अग्नि लिये) ऐसा कह। तब दोनों (अध्वर्यु और प्रतिप्रस्थाता) ईंधन रखकर एक-एक समिधा रखते हैं, और दोनों पहली आघार या आहुति छोड़ते हैं। इस प्रकार अध्वर्यु कहता है—'अग्निमग्नीत् संमृड्ढि ।' (हे अग्नीध्, अग्नि को ठीक कर)। अभी केवल कहा जाता है, अग्नि ठीक नहीं की जाती ॥१९॥ अब प्रतिप्रस्थाता (उस जगह जहाँ गृह-पत्नी होती है) लौटता है। वह पत्नी को ले जाने की इच्छा करता हुआ पूछता है—'तू किसके साथ सहवास करती है?' (केन चरसि ?)। यदि स्त्री एक की होकर दूसरे के साथ सहवास करे तो पाप करती है। वह इसलिये पूछता है कि कहीं वह मन में पछतावा करके आहुति न दे दे। निरुक्त पाप (अर्थात् पाप कहा हुआ) कम हो जाता है; क्योंकि यह सच होता है। इसलिये वह ऐसा पूछता है। यदि वह पाप को छिपा लेगी तो उसके सम्बन्धियों के लिए अहित होगा ॥२०॥ अब वह उससे कहलवाता है—"प्रघासिनो हवामहे मरुतश्च रिशादसः। करम्भेण