भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

पृष्ठ 309, कुल 699 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 309

कां० २, अ० ५, ब्रा० २, कं० ३७-४२ शतपथब्राह्मण / २६१ वह अब आज्य का नीचे का भाग (जुहू में) डालता है और वरुण की पयस्या में से दो भाग लेकर इनमें से किसी भाग के साथ मेष को रखता है। अब उन पर घी छोड़ता है और जहां से वे भाग काटे गये उस स्थान को पूर्ण कर देता है। फिर (दक्षिण की ओर) आ जाता है। इसके पश्चात् अध्वर्यु 'श्रौषट्' कहकर होता से कहता है, 'वरुणं यज ।' और 'वषट्कार' कहकर आहुति देता है ॥३७॥ अब अध्वर्यु बायें हाथ में दोनों स्रुचों को लेकर दाहिने हाथ से प्रतिप्रस्थाता का कपड़ा पकड़कर कहता है, 'मरुद्भ्योऽनुब्रूहि ।'-'मरुतों के लिए प्रार्थना कर ।' अब प्रतिप्रस्थाता आज्य के निचले भाग को (जुहू में) डालकर मरुतों के पयस्या से दो भाग काटकर किसी एक के साथ मेषी को रखता है और ऊपर से घी छोड़ता है और जहां से दो भाग काटे गये थे उनके स्थान की पूर्ति कर देता है और (दक्षिण की ओर) चला आता है। अब अध्वर्यु 'श्रौषट्' कहकर कहता है-'मरुतो यज ।' और वषट्कार कहकर आहुति देता है ॥३८॥ अब अध्वर्यु 'क' के एक कपालवाले पुरोडाश को लेता है और 'क' के एक कपालवाले पुरोडाश को लेकर अध्वर्यु कहता है, 'अग्नये स्विष्टकृतेऽनुब्रूहि ।'-'स्विष्टकृत् अग्नि के लिए प्रार्थना कर ।' अब अध्वर्यु सब हवियों में से एक-एक भाग लेता है; और प्रतिप्रस्थाता भी उसी पयस्या में से एक भाग लेता है। अब वे दो बार घी छोड़ते हैं और दोनों (दक्षिण की ओर) आते हैं। अध्वर्यु 'श्रौषट्' कहकर कहता है, 'अग्निं स्विष्टकृतं यज ।' वे दोनों 'वषट्' कहकर आहुति देते हैं ॥३६॥ अब अध्वर्यु अगला भाग काटता है। अब इडा को टुकड़े-टुकड़े करके प्रतिप्रस्थाता के हवाले करता है। प्रतिप्रस्थाता उन पर मरुतों के पयस्या से दो भाग रख देता है। (अध्वर्यु) उन पर दो बार घी छोड़ता है और 'इडा' कहकर वह अपने को पवित्र कर लेता है ॥४०॥ अब अध्वर्यु कहता है, 'ब्रह्मन् ! मैं आगे जाऊँ।' समिधाओं को रखकर कहता है, 'हे अग्नीध्र, अग्नि ठीक कर ।' अब अध्वर्यु स्रुचों में नवनी (पृषदाज्य) को डालता है। प्रति- प्रस्थाता भी यदि उसके पास नवनी हो तो उसके दो भाग करके स्रुचों में उँडेलता है। परन्तु यदि नवनी न हो तो उपभृति में जो घी हो उसके दो भाग करके अलग-अलग उँडेल देता है। अब वे दोनों (दक्षिण की ओर) चलते हैं और अध्वर्यु 'श्रौषट्' कहकर कहता है-'देवान् यज यज ।' इस प्रकार हर अनुयाज में कहता है और हर चौथे अनुयाज में चमचे में घी छोड़ता है। इस प्रकार वे दोनों नौ अनुयाज करते हैं। नौ प्रयाज और नौ अनुयाज क्यों किये जाते हैं? इसलिए कि दोनों बार प्रजा को वरुण के पाश से छुड़ाता है-पहले से, ऊपर के और पिछले से नीचे के। इसी- लिए नौ प्रयाज होते हैं, और नौ अनुयाज ॥४१॥ अब वे दोनों स्रुचों को (वेदी में) रखकर अलग कर देते हैं। स्रुचों को अलग करके, परिधियों पर घी डालकर और एक परिधि को लेकर 'श्रौषट्' कहकर अध्वर्यु होता से कहता है- 'दिव्य-होता लोग भद्र कहने के लिए बुलाये गये और मनुष्य-होता सूक्तवाक् अर्थात् प्रार्थना के