भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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कां० २, अ० ५, ब्रा० ३, कं० १-८ शतपथब्राह्मण / २६५ (वरुणप्रघास के) चौथे मास में यह (साकमेध) यज्ञ करता है। वह इस यज्ञ को दो लगातार दिनों में करता है ॥१॥ पहले दिन 'अनीकवत्' अग्नि के लिए आठ कपालों का पुरोडाश देता है, क्योंकि अग्नि को 'अनीक' (नुकीला) करके ही वे देव वृत्र को मारने दौड़े थे। और उस तेज को अग्नि ने छोड़ा नहीं। उसी प्रकार (यजमान भी) पापी अहितकारी शत्रु को मारने के लिए अग्नि को 'अनीक' (नुकीला) करके दौड़ता है। उस तेज को अग्नि नहीं छोड़ता, इसलिए 'अग्नि अनीकवत् के लिए' ॥२॥ दोपहर को 'सांतपन मरुतों' के लिए 'चरु' देता है। क्योंकि दोपहर को गर्म (सन्तप्त) हवाओं ने वृत्र को झुलसा दिया। इस प्रकार झुलसकर वह हाँफता हुआ और जख्मी पड़ा था। इसी प्रकार 'सांतपन मरुत्' (गर्म हवाएँ) उस यजमान के पापी, अहितकारी, शत्रु को झुलसा देते हैं, इसलिए 'सांतपन मरुतों के लिए' ॥३॥ इसके पश्चात् (सायंकाल को) 'गृहमेधी मरुतों' के लिए (चरु)। (पलाश की) शाखा से बछड़ों को दूर करके वह पवित्रोंवाले बर्तन में (गायों को) दुहकर चरु को पकाता है। जिसमें तण्डुल या चावल पकाते हैं वह 'चरु' कहलाता है। जिस अगले दिन देव वृत्र को मारने जा रहे थे उसकी शाम को देवों ने यही भोजन किया था (मेधो दधिरे)। यहाँ 'मेध' का अर्थ भोजन है ('Nourishment' according to Eggeling)। इसी प्रकार यह यजमान भी पापी अहितकारी शत्रु को मारने के लिए इसी मेध या भोजन को करता है। यह दूध और चावल दोनों का क्यों बनाते हैं ? दूध 'मेध' या शक्तिवाला भोजन है और चावल भी शक्तिवाला भोजन है। इस प्रकार वह अपने में दोनों शक्तियों (मेध) को धारण करता है। इसलिए दूध और चावल का चरु बनाते हैं ॥४॥ यह इस प्रकार से—जो कुशों से आच्छादित वेदी 'सांतपन मरुतों' के लिए थी, वही अब भी काम में आती है। इसी कुशों से आच्छादित (स्तीर्णा) वेदी में 'परिधि' और 'शकल' अर्थात् बड़ी समिधाओं और छोटे टुकड़ों को रखता है और उसी प्रकार दुहकर चरु पकाता है, और पकाकर और चुपड़कर (घी डालकर) आग से हटा लेता है ॥५॥ तब दो बर्तनों या थालियों को माँजता है। और उनमें उस (चरु) के दो बराबर भाग करके रख देता है। उनके बीच में गड्ढा करके उनमें घी छोड़ता है। अब स्रुवा और स्रुक् दोनों को पोंछता है, और भात के दोनों पात्रों को लेकर (वेदी तक) आता है। फिर वह स्रुवा और स्रुक् को लेकर (वेदी तक) आता है, और कुशों से आच्छादित वेदी को छूकर समिधाएं रखकर जितने टुकड़ों को चाहता है रख देता है। तब वह दोनों भात की थालियों को और स्रुवा और स्रुक् को यथोचित स्थान पर रख देता है। होता होता के आसन पर बैठ जाता है। स्रुवा और स्रुक् को लेकर अध्वर्यु कहता है—॥६॥ 'अग्नि के लिए कह।' अग्नि के आज्य भाग की ओर संकेत करके। दाहिने भात की प्याली के गड्ढे के घी में से चार भाग लेकर दक्षिण की ओर जाता है, और जाकर आग्नीध्र के लिए 'श्रौषट्' कहता है। फिर (होता से) कहता है, 'अग्निं यज।' और वषट्कार कहने के अनन्तर आहुति देता है ॥७॥ अब सोम के आज्य भाग की ओर संकेत करके कहता है, 'सोम के लिए कह।' और बायें भात की थाली के गड्ढे के घी में से चार भाग लेकर आता है और आकर 'श्रौषट्' कहकर वह

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