शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 335, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंकां० २, अ० ६, ब्रा० २, कं० ६-१७ शतपथब्राह्मण / ३१७ आहुतियों के द्वारा, उसके जो सन्तान हुई है उसको रुद्र के पंजे से छुड़ा देता है ॥६॥ और एक जो (पुरोडाश की टिकिया) उसको चूहे के बिल में गाड़ देती है, यह मन्त्र पढ़कर— “एष ते रुद्र भागऽआखुस्ते पशुः” (यजु० ३।५७)— “हे रुद्र ! यह भाग है और चूहा तेरा पशु है।” इस प्रकार वह चूहे को ही (रुद्र का पशु) नियत कर देता है और वह (रुद्र) किसी अन्य पशु को नहीं सताता । गाड़ता क्यों है ? इसलिए कि गर्भ गुप्त होते हैं। और जो गड़ा हुआ होता है वह भी गुप्त होता है। इसीलिए वह उसको गाड़ता है। इसके द्वारा वह अपनी उस सन्तान को जो अभी उत्पन्न नहीं हुई रुद्र के पंजे से छुड़ा देता है ॥१०॥ अब वे लौटकर यह मन्त्र जपते हैं— “अव रुद्रमदीमह्यव देवं त्र्यम्बकम् । यथा नो वस्य- सस्करद्यथा नः श्रेयसस्करद्यथा नो व्यवसाययात् ॥ भेषजमसि भेषजं गवेऽश्वाय पुरुषाय भेषजम् । सुखं मेषाय मेष्यै” (यजु० ३।५८, ५६)— “हम त्र्यम्बक देव रुद्र को सन्तुष्ट करते हैं कि वह हमको घर आदि से युक्त करे, हमको कल्याण दे, और हमको व्यवसायी बनावे” (यजु० ३।५८)— “हे रुद्र ! आप औषध हैं— गाय, घोड़े, पुरुष के लिए औषध हैं। भेड़ और भेड़ी के लिए सुख हैं (अर्थात् सब प्राणियों के लिए सुख के दाता हैं), इस यज्ञ में यह आशीर्वाद है” (यजु० ३।५६) ॥११॥ अब वे तीन बार वेदी के चारों ओर (बाईं ओर से) फिरते हैं, बाईं जांघों को पीटते हुए और यह मन्त्र जपते हुए— “त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्यो- र्मुक्षीय माऽमृतात्” (यजु० ३।६०) — “सुगन्धयुक्त और पुष्टि को बढ़ानेवाले त्र्यम्बक की हम स्तुति करते हैं कि वह हमको मौत के बन्धन से इस प्रकार छुड़ा ले जैसे उर्वारुक (लौकी) अपने डण्ठल से; परन्तु मोक्ष से नहीं” ॥१२॥ कुमारियां भी परिक्रमा करें, इसलिए कि उनका कल्याण हो । रुद्र की बहिन अम्बिका भाग्य की अधिष्ठात्री है। इसलिए कुमारियों को भी परिक्रमा देनी चाहिए, इस इच्छा से कि उनका भाग्य जागे ॥१३॥ उनके लिए यह मन्त्र है — “त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पतिवेदनम् । उर्वारुकमिव बन्धना- दितो मुक्षीय मामुतः” (यजु० ३।६०) — “हम सुगन्धयुक्त पतियों को प्राप्त करानेवाले त्र्यम्बक की स्तुति करती हैं कि वह हमको इस (लोक) से लौकी के डण्ठल की भाँति छुड़ा दे, न कि उस (लोक) से” (यजु० ३।६०) । 'इस (लोक) से' का तात्पर्य है 'मेरे माता-पिता आदि से ।' 'वहाँ से नहीं' का तात्पर्य है — 'पति से नहीं' । (अर्थात् वधू अपने माँ-बाप को छोड़कर पति के घर में नित्य रहने की प्रार्थना करती है) पति ही स्त्री की प्रतिष्ठा है । इसलिए कहती है 'वहाँ से नहीं' ॥१४॥ अब वे फिर वेदी के चारों ओर दाहिनी ओर से फिरते हैं, दाहिनी जांघों को पीटते हुए और वही मन्त्र जपते हुए । वे दाहिनी ओर घूमकर तीन बार क्यों फिरते हैं ? इसलिए कि वे समझते हैं कि ऐसा करने से हमारे दाहिनी ओर काम सिद्ध होगा । इसलिए वे तीन बार दाहिनी ओर से परिक्रमा देते हैं ॥१५॥ अब यजमान इन बचे हुए पुरोडाश की टिकियों को अंजलि में लेकर ऊपर को इस प्रकार फेंकता है कि गौ न छू सके, और फिर हाथ में लेता है। जो पकड़ में नहीं आते और गिर पड़ते हैं उनको केवल छू लेता है। इस प्रकार वे उनको औषध के समान बनाते हैं। इसलिए यदि वे पकड़ में नहीं आते तो छू लेता है ॥१६॥ अब इनको दो टोकरियों में रखकर और या तो बाँस के दो सिरों से या तराजू की डण्डी के दो सिरों से बाँधकर उत्तर की ओर चलता है । और रास्ते में कोई वृक्ष, ठूंठ, बाँस या चिटोहर