भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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का० ३, अ० १, ब्रा० ४, क० ५-१५ शतपथब्राह्मण / ३४३ होती हैं। इससे पांच की प्राप्ति होती है, इसलिए पांच आहुतियाँ दी जाती हैं ॥५॥ होम की ये आहुतियाँ हैं- पहली- "आकूत्यै प्रयुजेऽग्नये स्वाहा" (यजु० ४।७) -"विचार, प्रयोग और अग्नि के लिए स्वाहा।" पहले यज्ञ का विचार ही करता है (कुरुते)। अब इस आहुति में जो यज्ञ का भाग शामिल है उसे अपना बना लेता है ॥६॥ दूसरी- "मेधायै मनसेऽग्नये स्वाहा" (यजु० ४।७) - "बुद्धि, मन और अग्नि के लिए स्वाहा।" बुद्धि और मन से वह यज्ञ करना चाहता है। अब इस आहुति में जो यज्ञ का भाग है उसको अपना बना लेता है ॥७॥ "दीक्षायै तपसेऽग्नये स्वाहा" (यजु० ४।७) - "दीक्षा, तप और अग्नि के लिए स्वाहा।" यह केवल बोला जाता है। इससे आहुति नहीं दी जाती ॥८॥ तीसरी- "सरस्वत्यै पूष्णेऽग्नये स्वाहा" (यजु० ४।७) -"सरस्वती, पूषा और अग्नि के लिए स्वाहा।" वाणी सरस्वती है। वाणी यज्ञ है। पशु पूषा हैं क्योंकि पूषा का अर्थ है पुष्टि। पशु पुष्टि हैं और पशु यज्ञ हैं। इस (तीसरी) आहुति में जो यज्ञ का भाग है उसको वह अपना बना लेता है ॥९॥ इस पर कहा जाता है कि ये आहुतियाँ अनिश्चित हैं। ये प्रतिष्ठित नहीं हैं। इनमें किसी देवता, इन्द्र, सोम या अग्नि का नाम नहीं है ॥१०॥ "आकूत्यै प्रयुजेऽग्नये स्वाहा" में किसी देवता का निश्चय नहीं है। (इस आक्षेप का उत्तर यह है कि) अग्नि तो निश्चित है। अग्नि प्रतिष्ठित है। जब अग्नि में आहुतियाँ दी जाती हैं तो वे निश्चित हो जाती हैं। इसीलिए ये सब आहुतियाँ 'अग्नये स्वाहा' कहकर दी जाती हैं। इन आहुतियों को 'अधीत यजूंषि' कहते हैं ॥११॥ "आकूत्यै प्रयुजेऽग्नये स्वाहा।" यहाँ वह आत्मा से ही यज्ञ का विचार करता है और आत्मा से ही प्रयोग करता है। ये दोनों देवता अर्थात् आकूति (विचार) और प्रयुक् (प्रयोग) आत्मा में ही उठते हैं (अधीत) ॥१२॥ "मेधायै मनसेऽग्नये स्वाहा।" यहाँ मेधा और मन से यज्ञ की प्राप्ति करता है, इसलिए मेधा और ये दोनों देवता स्थित होते हैं ॥१३॥ "सरस्वत्यै पूष्णेऽग्नये स्वाहा।" वाणी ही सरस्वती है। वाणी यज्ञ है। यह सरस्वती देवता आत्मा में स्थित होता है। पशु पूषा हैं। पूषा पुष्टि है। पशु यज्ञ हैं। आत्मा में पशु स्थित होते हैं। इसलिए 'अधीत यजूंषि' इनका नाम हुआ ॥१४॥ अब चौथी आहुति देता है- "आपो देवीर्बृहतीर्विश्वशम्भुवो द्यावापृथिवीऽउरोऽ अन्तरिक्ष । बृहस्पतये हविषा विधेम स्वाहा" (यजु० ४।७) - "हे दिव्य, बड़े, संसार के हितकारक आपो देवता, हे द्यावापृथिवी, हे विस्तृत अन्तरिक्ष ! हम हवि से बृहस्पति की पूजा करें।" ये आहुति यज्ञ के घनिष्ठ हैं। आपो देवता की कीर्तियां हैं। 'आप' ही यज्ञ है। "द्यावापृथिवी, उरोऽन्तरिक्ष" से लोकों की कीर्ति कहता है। "बृहस्पतये हविषा विधेम स्वाहा।" यहाँ ब्रह्म की बृहस्पति है। ब्रह्म ही यज्ञ है। इस प्रकार यह आहुति यज्ञ से घनिष्ठ सम्बन्ध रखतीहै ॥१५॥