भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

पृष्ठ 363, कुल 699 में से

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कां० ३, अ० १-२, ब्रा० ४-१, कं० १६-२३ व १-३ शतपथब्राह्मण/ ३४५ अब जो स्रुक् से पाँचवीं आहुति दी जाती है वह तो साक्षात् यज्ञ है, क्योंकि यह अनुष्टुभ् छन्द में दी जाती है। वाणी अनुष्टुभ् है। वाणी यज्ञ है ॥१६॥ ध्रुवा में जो आज्य बच रहता है वह जुहू में छोड़ा जाता है। अब तीन बार स्रुवा से आज्य घी पिघलनेवाले पात्र से जुहू में डालते हैं। तीसरी बार जो लेता है उससे स्रुवा को भर लेता है ॥१७॥ अब वह इस मन्त्र से आहुति देता है—"विश्वो देवस्य नेतुर्मर्तो वुरीतः सख्यम् । विश्वे रायऽइषुध्यति द्युम्नं वृणीत पुष्यसे स्वाहा" (यजु० ४।८; ऋ० ५।५०।१) —"सब आदमी दिव्य नेता की मित्रता को ग्रहण करें। सब धन को चाहते हैं। अपनी पुष्टि के लिए यश को चाहें" ॥१८॥ यह आहुति और ऋचा देवताओं की अपेक्षा से सम्बन्धित है—'विश्वो देवस्य' से तात्पर्य है वैश्वदेव का, 'नेतुः' से सविता का, 'मर्तो वुरीतः' से मित्र का, 'द्युम्नं वृणीत' से बृहस्पति का, 'पुष्य' से पूषा का ॥१९॥ यह आहुति और ऋचा देवताओं की अपेक्षा से पाँच से सम्बन्धित है। यज्ञ के पाँच भाग हैं। पशु के पाँच भाग हैं। ऋतुएँ पाँच हैं। इस प्रकार पाँच देवताओं वाली आहुति के द्वारा वह सम्वत्सर की प्राप्ति कर लेता है ॥२०॥ इसको वह अनुष्टुभ् छन्द में देता है। वाणी अनुष्टुभ् है। वाणी यज्ञ है। इस प्रकार प्रत्यक्ष यज्ञ की प्राप्ति करता है ॥२१॥ इस पर कहते हैं कि बस इसी एक आहुति को देवे। अन्य आहुतियाँ जिस-जिस कामना के लिए दी जाती हैं वे सब इसी से पूरी हो जाती हैं। जो इस आहुति को देता है, पूर्ण आहुति को देता है। 'सर्व' का अर्थ है पूर्ण। स्रुवा को भरकर वह जुहू को भर लेता है और जुहू को पूरा- पूरा छोड़ देता है। परन्तु यह केवल कथन मात्र है। आहुतियाँ तो पाँचों ही दी जाती हैं ॥२२॥ इसको अनुष्टुभ् छन्द में देते हैं। अनुष्टुभ् में ३१ अक्षर होते हैं। दस हाथ की उँगलियाँ हैं, दस पैर की, दस प्राण हैं। ३१वाँ आत्मा जिसमें ये प्राण हैं। इतना ही पुरुष है। पुरुष यज्ञ है। उतने ही यज्ञ के भाग हैं जितने पुरुष के। इसलिए जितना यज्ञ है, जितनी उसकी मात्रा है, उतनी ही वह इस ३१ अक्षरवाले अनुष्टुभ् की आहुति देकर उसको प्राप्त कर लेता है ॥२३॥ अध्याय २--ब्राह्मण १ आहवनीय के दक्षिण की ओर दो मृगचर्मों को इस प्रकार बिछाता है कि उनकी गर्दन पूर्व की ओर रहे। उन पर वह उसको दीक्षा देता है। ये जो दो होते हैं ये दोनों लोकों के रूप हैं। इस प्रकार वह उसको इन दोनों लोकों में दीक्षित करता है ॥१॥ ये दोनों सिरों पर जुड़े होते हैं। ये दोनों लोक भी सिरे पर जुड़े होते हैं। पीछे की ओर ये छिद्रों द्वारा जुड़े होते हैं। इन दोनों लोकों को जोड़कर वह उसको दीक्षा देता है ॥२॥ यदि एक ही चर्म हो तो वह इन तीनों लोकों का रूप है। इस प्रकार वह उसको इन तीनों लोकों में दीक्षित करता है। जो श्वेत बाल हैं वे द्यौ का रूप हैं, जो काले हैं वे इस पृथिवी

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