शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 365, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंकां ३, अ० २, ब्रा० १, कं० ३-११ शतपथब्राह्मण / ३४७ का। या इसके विपरीत यों भी कह सकते हैं कि जो काले बाल हैं वे द्यौ का रूप हैं और जो श्वेत बाल हैं वे इस पृथिवी का । जो भूरे पीले-पीले हैं वे अन्तरिक्ष का रूप हैं । इस प्रकार वह उसको इन तीनों लोकों में दीक्षित करता है ॥३॥ अन्त में उसे उस (मृगचर्म) के पीछे को मुड़ना चाहिए। इन लोकों को जोड़कर वह उसको उनमें दीक्षित करता है ॥४॥ अब वह मृगचर्मों के पीछे पूर्वाभिमुख और जानु को झुकाकर बैठ जाता है और जहाँ सफेद और काले बाल मिलते हैं वहाँ इस प्रकार (श्वेत बाल अँगूठे से और काले अगली अँगुली से एक-साथ) छूकर यह मन्त्र पढ़ता है-“ऋक् सामयोः शिल्पे स्थः” (यजु० ४।६) - "तुम ऋक् और साम के प्रतिरूप हो ।” शिल्प कहते हैं प्रतिरूप को। इसका तात्पर्य यह है कि 'ऋचाओं और सामों के प्रतिरूप* हो' ॥५॥ अब कहता है, "ते वामारभे" (यजु० ४।६)-"मैं तुमको छूता हूँ।" जो दीक्षित होता है वह गर्भ बनकर छन्दों में घुस जाता है । इसलिए उसकी अंगुलियाँ सिकुड़ जाती हैं। गर्भ बँधी हुई मुट्ठी के समान होते हैं ॥६॥ और जब वे कहते हैं 'मैं तुमको छूता हूँ' तो इसका तात्पर्य है कि 'मैं तुममें प्रवेश करता हूँ।' अब कहता है- ते मा पातमास्य यज्ञस्योदृचः” (यजु० ४।६) – “तुम मेरी इस यज्ञ के अन्त तक रक्षा करो ।” इसका तात्पर्य है कि तुम यज्ञ के अन्त तक मेरी रक्षा करो ॥७॥ अब दाहिनी जानु से उठता है। और पढ़ता है-“शर्मासि शर्म मे यच्छ" (यजु० ४।६)- "तू शरण (कल्याण) है, मुझे शरण दे'-"नमस्तेऽअस्तु मा मा हिंसी” (यजु० ४।६)-"तुझे नमस्कार हो । तू मुझे पीड़ा न दे ।” मनुष्य के लिए तो वह काला मृग का चर्म है । देवताओं के लिए यह 'शर्म' या 'शरण' है । जो अपने को यज्ञ के तल तक उठाता है वह मानो अपने को उच्चतर तल तक उठाता है । यह काला मृगचर्म यज्ञ है । इस प्रकार वह उस यज्ञ को प्रसन्न करता है जिससे वह यज्ञ उसे हानि न पहुँचावे । इसलिए कहता है- 'नमस्ते अस्तु मा मा हिंसीः' ॥८॥ पहले वह मृगचर्म के पीछे की ओर बैठे । यदि पहले ही बीच में बैठ जावे और कोई उसको शाप दे कि 'यह नष्ट हो जायगा' या 'इसका पतन हो जायगा' तो ऐसा हो ही जायगा । इसलिए उसको मृगचर्म के पिछले भाग में ही बैठना चाहिए ॥६॥ अब वह मेखला को पहनता है। पहले अंगिरा लोगों को दीक्षा दी जाने लगी तो उनमें निर्बलता आ गई, क्योंकि उन्होंने व्रत के दूध के सिवाय और कुछ खाना नहीं तैयार किया था। तब उन्होंने इस (मेखला-सम्बन्धी) बल को देखा और उसको प्राप्त करके शरीर के बीच (कमर) में बाँधा। इससे इनको पूर्णता प्राप्त हो गई ॥१०॥ यह (मेखला) सन की बनाई जाती है। सन की इसलिए बनाई जाती है कि नर्म रहे । जब प्रजापति गर्भ होकर उस यज्ञ से निकला, तब जो उसका उल्ब था वह सन बन गया। इसीलिए उनमें बू आती है। और जो जरायु था वह दीक्षित का वस्त्र हो गया। उल्ब जरायु के
- सामानि यस्य लोमानि ।