शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 371, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंका० ३, अ०, २, ब्रा० १, कं० ३०-४० शतपथब्राह्मण / ३५३ (यजु० ४।१०)-"कृषि को धान्य-पूरित कर।" इस प्रकार वह यज्ञ को उत्पन्न करता है क्योंकि जब सुकाल होता है तो यज्ञ के लिए पुष्कल सामग्री होती है। और जब दुष्काल होता है तो अपने लिए भी काफी नहीं होता। इसलिए यज्ञ को उत्पन्न करता है ॥३०॥ दीक्षित को खुजलाना नहीं चाहिए, न लकड़ी से, न नाखून से। जो दीक्षित होता है वह गर्भ हो जाता है। गर्भ को यदि कोई नाखून से या लकड़ी से खुजलावे तो वह बाहर निकल- कर मर जायगा। इससे दीक्षित पुरुष को खुजली हो जायगी और उसके बाद उसकी जो सन्तान (रेत का अर्थ यहाँ सन्तान है) होगी वह भी खू़जलीवाली पैदा होगी। अपनी ही योनि अपनी सन्तान को हानि नहीं पहुँचाती। और यह जो कृष्णमृग का सींग है यह उसकी योनि है। इस- लिए वह उसको हानि नहीं पहुँचाता। इसलिए दीक्षित को चाहिए कि कृष्णमृग के सींग से ही खुजलावे। कृष्णमृग के सींग के सिवाय किसी अन्य चीज से न खुजलावे ॥३१॥ अब (अध्वर्यु) उसको दण्ड (डण्डा) देता है। राक्षसों को दूर करने के लिए, क्योंकि डण्डा वज्र है ॥३२॥ यह उदुम्बर का होता है। तेज और अन्न की प्राप्ति के लिए, क्योंकि उदुम्बर अन्न और तेज है। इसलिए डण्डा उदुम्बर लकड़ी का होता है ॥३३॥ यह डण्डा उसके मुख तक पहुँचना चाहिए। उतना ही उसका वीर्य (बल) होता है। जो डण्डा मुख तक पहुँचता है वह उसके वीर्य (पराक्रम की शक्ति) के बराबर होता है ॥३४॥ वह इस मन्त्र को पढ़कर उसको खड़ा करता है—"उच्च्छ्रयस्व वनस्पतऽऊर्ध्वो मा पाह्यँहसऽआस्य यज्ञस्योदृचः" (यजु० ४।१०)—"हे डण्डे, तू खड़ा हो। इस यज्ञ के अन्त तक पहुँचने के लिए मुझे पाप से बचा।" इसका तात्पर्य यह है कि यज्ञ की समाप्ति तक खड़ा होकर मेरी रक्षा कर ॥३५॥ इसी अवसर पर कुछ लोग अंगुलियों को चटकाते और वाणी को बोलते हैं, क्योंकि अब इसके पीछे कुछ भी न बोल सकेगा। परन्तु ऐसा नहीं करना चाहिए क्योंकि अगर कोई भाग जाय और दूसरा उसको पकड़ने दौड़े और न पकड़ पावे, इस प्रकार यहाँ वह यज्ञ को नहीं पकड़ पावेगा। इसलिए उसी (पहले कहे अवसर पर) अँगुलियों को चटकावे और वाणी को बोले ॥३६॥ जब दीक्षित पुरुष (वाणी को रोकने के पश्चात्) या तो कोई ऋचा बोले, या साम या यजुः, तो वह यज्ञ को स्थिर बनाता है। इसलिए उसी अवसर पर अँगुलियों को चटकाता और वाणी को रोकता है ॥३७॥ और जब वह वाणी को रोकता है तो मानो यज्ञ को उसी के आत्मा में स्थापित करता है क्योंकि वाणी यज्ञ है। परन्तु जब वाणी को रोककर उससे यज्ञ से इतर कोई बात कहता है तो यज्ञ छूटकर भाग जाता है। उस समय विष्णु-सम्बन्धी ऋचा या यजुः का पाठ करना चाहिए, क्योंकि यज्ञ विष्णु है। इस प्रकार वह फिर यज्ञ को प्राप्त कर लेता है। यही उस भूल का प्रायश्चित्त है ॥३८॥ इस पर कोई पुकारता है, 'यह ब्राह्मण दीक्षित हो गया, यह ब्राह्मण दीक्षित हो गया।' इस प्रकार घोषित करके वह इसको देवताओं के प्रति घोषित करता है, 'यह महावीर्य है। इसने यज्ञ को पा लिया। यह तुममें से एक हो गया। इसकी रक्षा कीजिए।' वह तीन बार कहता है क्योंकि यज्ञ तीन भागों वाला है ॥३६॥ उसे अब तक 'ब्राह्मण' कहते हैं। उसका ब्राह्मण होना अनिश्चित है, क्योंकि ऐसा