शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 373, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंकां० ३, अ० २, ब्रा० १-२, कं० ४० व १-८ शतपथब्राह्मण / ३५५ कहा जाता है कि राक्षस लोग स्त्रियों के पीछे घूमा करते हैं और उनमें अपना वीर्य स्थापित कर देते हैं। इसलिए सच्चा ब्राह्मण वही है जो यज्ञ से उत्पन्न होता है। इसलिए क्षत्रिय या वैश्य को भी ब्राह्मण कहना चाहिए, क्योंकि जो यज्ञ से उत्पन्न होता है वह ब्राह्मण ही है। इसलिए कहते हैं कि यज्ञ करनेवाले को कभी न मारे । ऐसा करना महापाप है ॥४०॥ अध्याय २—ब्राह्मण २ वह बोलता नहीं । सूर्यास्त तक मौन रखता है। न बोलने का कारण यह है ॥१॥ देवों को जो महत्ता प्राप्त है वह उनको यज्ञ से मिली है। उन्होंने कहा, 'कौन-सी विधि हो कि जो लोक हमको प्राप्त हैं उसे मनुष्य न ले सकें ?' उन्होंने यज्ञ के रस को इस प्रकार चूस लिया जैसे मधुमक्खी शहद को चूसती है, और चूसे हुए यज्ञ के फोक को यूप के पास फैलाकर छिप गये। यूप को यूप इसलिए कहते हैं कि इसके पास उन्होंने यज्ञ को बिखेर दिया (अयोपयन्) ॥२॥ ऋषियों ने इस बात को सुना। उन्होंने यज्ञ को इकट्ठा किया। जैसे वह यज्ञ इकट्ठा किया गया, इसी प्रकार जो पुरुष दीक्षित हो जाता है वह भी यज्ञ को इकट्ठा करता है। वाणी ही यज्ञ है ॥३॥ सूर्य के अस्त होने पर मौन तोड़ता है। प्रजापति सम्वत्सर है। प्रजापति यज्ञ है। रात- दिन सम्वत्सर हैं, क्योंकि दोनों घूम-फिरकर सम्वत्सर बनाते हैं। वह दिन में दीक्षित हुआ और अब उसने रात प्राप्त कर ली। जितना यज्ञ है, जितनी इसकी मात्रा है उतना ही प्राप्त करके वह मौन को तोड़ता है ॥४॥ कुछ लोगों की राय है कि जब तारा दीख जाय तो मौन तोड़ दे, क्योंकि तभी सूर्य अस्त हुआ समझा जाता है। परन्तु ऐसा न करे, क्योंकि यदि बादल हो तो कैसा होगा ? इसलिए जब समझे कि सूर्य अस्त हो गया तभी मौन तोड़ दे ॥५॥ कुछ लोग 'भूर्भुवः स्वः' कहकर मौन तोड़ते हैं। क्योंकि इस प्रकार यज्ञ में बल आ जाता है, यज्ञ चंगा हो जाता है। परन्तु ऐसा न करे, क्योंकि ऐसा करने से न तो यज्ञ में बल आता है न वह चंगा ही होता है ॥६॥ इस मन्त्र से मौन तोड़े— "व्रतं कृणुत व्रतं कृणुताग्निर्ब्रह्माग्निर्यज्ञो वनस्पतिर्यज्ञियः" (यजु० ४।२१)—"व्रत (व्रत का भोजन) करो क्योंकि अग्नि ब्रह्म है, अग्नि यज्ञ है, वनस्पति यज्ञ के लिए है।" यही उसका इस समय का यज्ञ है। यही हवि है जैसे पहले अग्निहोत्र था। इस प्रकार यज्ञ से यज्ञ को पुष्ट करता है, यज्ञ में यज्ञ की प्रतिष्ठा करता है, यज्ञ से यज्ञ को तानता है। क्योंकि यह व्रत का भोजन सोम खींचने तक काम देता है। वह 'व्रतं कृणुत' को तीन बार दुहराता है क्योंकि यह यज्ञ तीन भागोंवाला है ॥७॥ वह अग्नि की ओर घूमकर मौन तोड़ता है। जो और कुछ पढ़कर मौन तोड़ता है वह न