भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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कां० ३, अ० ४, ब्रा० २; कं० २-१० शतपथब्राह्मण / ४०१ उन्होंने इन्द्र की श्रेष्ठता मान ली, इसलिए इन्द्र ही सर्व-देवता है। इन्द्र ही को देवों ने श्रेष्ठ माना है ॥२॥ इसलिए आपस में झगड़ना नहीं चाहिए। क्योंकि इनका कोई (शत्रु) दूर भी होता है तो इनमें घुस आता है, और शत्रु को जो प्रिय होता है वे उसी को करने लगते हैं, और शत्रु उनका विध्वंस कर देता है। इसलिए झगड़ा नहीं करना चाहिए। जिसको इसका ज्ञान है वह झगड़ता नहीं और वही करता है जो शत्रु को अप्रिय होता है, और शत्रु उसका नाश नहीं कर सकता; इसलिए झगड़ा नहीं करना चाहिए ॥३॥ तब उन्होंने कहा कि ऐसी बात करनी चाहिए कि यह हमारी मैत्री अजर-अमर हो जाय और कभी नष्ट न हो ॥४॥ [शतम् १७००] उन दोनों ने अपने प्रिय शरीरों और धामों को एकत्र कर लिया अर्थात् अपनी शक्तियों को संयुक्त किया और कहने लगे कि हमारी इस सन्धि का हममें से जो कोई उल्लङ्घन करेगा वही नाश को प्राप्त हो जायेगा। इसका उपद्रष्टा (गवाह) कौन है? 'बलवान् तनून्पात् ।' यह जो बहता है अर्थात् वायु, वही बलवान् तनून्पात् है। यही प्रजाओं का उपद्रष्टा (गवाह) है क्योंकि यह प्राण और उदान होकर घुसता है ॥५॥ इसीलिए कहा है- 'देव मनुष्यों के मन की बात जानते हैं।' जो संकल्प मन में उठता है वह प्राण तक आता है, प्राण से वायु तक, वायु देवताओं को बता देता है कि मनुष्य के मन में क्या है ॥६॥ यही बात है जो ऋषि ने कही थी-'जो मन में संकल्प होता है वह वायु को पहुँच जाता है, वायु देवताओं से कह देता है कि इस पुरुष के मन में यह है।' (प्रतीत होता है कि यहाँ वायु का अर्थ है वात-संस्थान या Nervous System और देवों का इन्द्रियाँ। मन के संकल्प Nervous System के द्वारा इन्द्रियों तक आते हैं यह एक स्पष्ट बात है) ॥७॥ देवों ने अपने प्यारे शरीरों और धामों को (शक्तियों को) एकत्र कर लिया और उन्होंने कहा कि हममें से जो इस सन्धि का उल्लङ्घन करेगा वह हममें से निकल जायगा और उसका नाश हो जायगा। और अब भी देव इसका उल्लङ्घन नहीं करते। क्योंकि अगर वे उसका उल्लङ्घन करें तो उनकी क्या दशा हो ! वे झूठे पड़ जायें। देव एक ही व्रत पर चलते हैं, वह है सत्य। इसी से उनकी विजय होती है और कोई उनको जीत नहीं सकता। जो इस रहस्य को जानकर सत्य बोलता है उसकी जीत होती है, उसको कोई पराजित नहीं कर सकता। अब तनूनप्त्र यही व्रत है ॥८॥ देवों ने अपने प्यारे शरीर और धामों (शक्तियों) को संयुक्त कर लिया। घी की आहुतियों को ग्रहण करके ही वे अपने शरीरों और धामों को संयुक्त करते हैं। ऐसा न चाहिए कि हर किसी के साथ अपनी शक्तियाँ जोड़ दी जायें, क्योंकि दूसरे का उन पर साझा हो जाता है। परन्तु जिसके साथ सन्धि करे उसका उल्लङ्घन न करे, क्योंकि कहा है कि 'जिसके साथ तनून्पात् सन्धि हो जाय उसके साथ द्रोह न करना चाहिए' ॥९॥ अब पहले इस मन्त्र से आज्य ग्रहण करता है- "आपतये त्वा परिपतये गृह्णामि” (यजु० ५।५)- "मैं तुझको उसके लिए लेता हूँ जो आगे को बहता है, जो चारों ओर बहता है (अर्थात् वायु) ।" यह जो बहनेवाला वायु है वही 'आपतित' और 'परिपतित' अर्थात् आगे को