भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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का० ३, अ० ४-५, ब्रा० ४-१, कं० २६-२७ व १-१० शतपथब्राह्मण / ४१५ पहले दिन एक थन दुहता है, दूसरे दिन दो, तीसरे दिन तीन, वे चौड़े होते जाते हैं। और जिनमें पहले दिन तीन थन दुहता है, दूसरे दिन दो, तीसरे दिन एक, वे तंग हो जाते हैं। जो तंग होते जाते हैं वह ऐसे ही हैं जैसे चौड़े । और जो चौड़े होते जाते हैं ऐसे ही हैं जैसे तंग ॥२६॥ लोकों को तप से जीतते हैं। जो इस रहस्य को समझकर उन उपसदों को लेता है जो तंग होते जाते हैं, उसका तप बढ़ता जाता है और उसका श्रेय बढ़ता है और वह लोक में अच्छा हो जाता है । इसलिए उन उपसदों को लेना चाहिए जो तंग होते जाते हैं। अगर बारह उपसदों को लेवे तो चार दिन तक तीन थन दुहने चाहिएँ, चार दिन तक फिर दो थन, और फिर चार दिन तक एक थन ॥२७॥ अध्याय ५—ब्राह्मण १ शाला के पूर्व की ओर का जो सबसे बड़ा खम्भा होता है उससे पूर्व की ओर तीन पग चलता है । और वहाँ एक कील गाड़ देता है जिसको 'अन्तः-पात' कहते हैं ॥१॥ इस बीच की कील से दक्षिण की ओर पन्द्रह पग चलता है और वहाँ एक कील गाड़ता है। उसको 'दक्षिणा श्रोणि' (दाहिना कूल्हा) कहते हैं ॥२॥ इस बीच की कीली से उत्तर की ओर पन्द्रह पग चलता है और वहाँ एक कील गाड़ता है । उसको 'उत्तरा-श्रोणि' (बायाँ कूल्हा) कहते हैं ॥३॥ इस बीच की कील से पूर्व की ओर छत्तीस पग चलता है और वहाँ एक कील गाड़ता है। उसको 'पूर्वार्ध' कहते हैं ॥४॥ इस बीच की कील से दक्षिण की ओर बारह पग चलता है और वहाँ एक कील गाड़ता है । उसको 'दक्षिणोऽसः' (दायाँ कंधा) कहते हैं ॥५॥ इस बीच की कील से बारह पग उत्तर की ओर चलता है और वहाँ एक कील गाड़ता है । उसको 'उत्तरोऽसः' (बायाँ कंधा) कहते हैं। यही वेदी की मात्रा (प्रमाण) है ॥६॥ यह पीछे तीस पग इसलिए होती है कि विराट् छन्द में तीस अक्षर होते हैं। और विराट् छन्द के द्वारा ही देवों ने इस लोक में प्रतिष्ठा पाई । इसी प्रकार यह भी विराट् छन्द द्वारा इस लोक में प्रतिष्ठा प्राप्त कर लेता है ॥७॥ तैंतीस पग भी हो सकते हैं। क्योंकि विराट् में तैंतीस अक्षर भी होते हैं और विराट् के द्वारा ही वह इस लोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥८॥ पूर्व में छत्तीस पग क्यों होते हैं ? बृहती छन्द छत्तीस अक्षर का होता है। बृहती के द्वारा ही देव लोग स्वर्गलोक को प्राप्त हुए । इसी प्रकार यह भी बृहती छन्द द्वारा स्वर्गलोक को प्राप्त करता है । उसकी आहवनीय अग्नि द्यौलोक में होती है ॥९॥ वेदी आगे की ओर २४ पग की क्यों होती है ? गायत्री चौबीस अक्षर की होती है । गायत्री यज्ञ का पूर्वार्ध है। इसलिए वह आगे को चौबीस पग चौड़ी होती है। वेदी की यही मात्रा