शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 457, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंकां० २, अ० ६, ब्रा० १, कं० ६-१६ शतपथब्राह्मण / ४३६ इसीलिए उनका 'यव' (जौ) नाम पड़ा ॥६॥ उन्होंने कहा कि सब ओषधियों में जो रस है उस सब को हम जौ में रख दें। इसलिए जो रस सब ओषधियों में था उसको उन्होंने जौ में रख दिया। इसलिए जब ओषधियाँ सूख जाती हैं तो जौ हरे-भरे रहते हैं क्योंकि देवों ने इनमें इस प्रकार रस भर दिया है। इसी प्रकार यजमान भी इन्हीं जौ के द्वारा शत्रु के सब अन्नों को खींच लेता है। इसीलिए प्रोक्षणी पात्र के जलों में जौ रहते हैं ॥१०॥ वह इस (गड्ढे) में जौ को डाल देता है इस मंत्रांश को पढ़कर-“यवोऽसि यवयास्मद्- द्वेषो यवयारातीः" (यजु० ५।२६)-"तू जौ है तो हमसे शत्रु को हटा दे (यवय) और बुरी बातों को हटा दे (यवय) ।" यह सब स्पष्ट है। अब जल-सिंचन करता है। जल-सिंचन का एक ही प्रयोजन है अर्थात् यज्ञ की पवित्रता ॥११॥ वह इस मन्त्र से जल-सिंचन करता है - "दिवे त्वान्तरिक्षाय त्वा पृथिव्यै त्वा" (यजु० ५।२६)-"तुझको द्यौलोक के लिए, अन्तरिक्ष के लिए और पृथिवी के लिए।" इस प्रकार वह इन लोकों को शक्ति और रस से पूर्ण करता है। शक्ति और रस को इन लोकों में स्थापित करता है ॥१२॥ अब जो जल प्रोक्षणी में बच रहता है उसको सूराख में डाल देता है यह कहकर, "शुन्धन्तां- ल्लोकाः पितृषदनाः" (यजु० ५।२६)-"जहाँ पितृ रहते हैं वे लोक शुद्ध हों।" यह जो गड्ढा खोदा जाता है वह पितरों का है। इसको वह यज्ञ के लिए शुद्ध करता है ॥१३॥ अब वह उनमें कुश बिछा देता है। इस प्रकार कि उनके अग्रभाग पूर्व की ओर रहें और उत्तर की ओर, यह कहकर- "पितृषदनमसि" (यजु० ५।२६)-"तू पितरों की बैठक है।" क्योंकि इसका जितना भाग खोदा जाता है वह पितरों का होता है। मानो वह खोदा नहीं गया, वृक्षों के साथ मिल गया। इस प्रकार वह वृक्षों के समान हो जाता है ॥१४॥ अब वह इसको इस मन्त्र से उठाता है- "उद्दिव ँस्तभानान्तरिक्षं पृण दृ ँहस्व पृथिव्याम्" (यजु० ५।२७)-"द्यौलोक को उठा, अन्तरिक्ष को भर और पृथिवी को दृढ़ कर ।" इस प्रकार वह इन लोकों को शक्ति और रस से युक्त करता है और इन लोकों में शक्ति और रस स्थापित करता है ॥१५॥ अब वह उसको (गड्ढे में) गाड़ देता है, यह मन्त्र पढ़कर- "द्युतानस्त्वा मारुतो मिनोतु" (यजु० ५।२७)-"मरुत् का पुत्र द्युतान तुझको गाड़े।" यह जो हवा चलती है उसी को 'मारुत द्युतान' कहते हैं। उसी से वह गाड़ता है- "मित्रावरुणौ ध्रुवेण धर्मणा" (यजु० ५।२७)-"मित्र और वरुण के दृढ़ धर्म के द्वारा।" प्राण और उदान का नाम मित्र-वरुण है। प्राण और उदान से इसको गाड़ता है ॥१६॥ अब वह चारों ओर मिट्टी इकट्ठी करता है इस मन्त्रांश से- "ब्रह्मवनि त्वा क्षत्रवनि रायस्पोषवनि पर्यूहामि" (यजु० ५।२७)-"मैं तुझको घेरता हूँ, हे ब्रह्मत्व के प्राप्त करनेवाले, क्षत्रियत्व के प्राप्त करनेवाले, धन के प्राप्त करनेवाले !" यजुओं में आशीर्वाद बहुत हैं। इससे वह ब्रह्मत्व और क्षत्रियत्व के लिए आशीर्वाद देता है। 'रायस्पोषवनि' से पुष्कलता से प्रयोजन है। उसी पुष्कलता के लिए आशीर्वाद देता है ॥१७॥ अब वह इस मन्त्रांश को पढ़कर मिट्टी को दबा-दबाकर मजबूत करता है- "ब्रह्म दृ ँह क्षत्रं दृ ँह्यायुर्दृ ँह प्रजां दृ ँह" (यजु० ५।२७)- "ब्रह्मत्व को दृढ़ कर, क्षत्रियत्व को दृढ़ कर आयु को दृढ़ कर, प्रजा को दृढ़ कर ।" यही इस कर्म का आशीर्वाद है। वह इससे यही आशीर्वाद देता है। वह इतना दबाता है कि मिट्टी भूमि के बराबर हो जाती है। या गड्ढे की भूमि कुछ ऊँची होती है। यह ऊँचाई देवतापन हो जाती है; इसका तात्पर्य यह है कि यह गड्ढा असाधारण हो जाता है ॥१८॥ अब वह उस पर पानी छिड़कता है। जहाँ कहीं भूमि में गड्ढा खोदते हैं तो उसमें धान उत्पन्न कर देते हैं। जल शान्तिदायक है। जल से शान्ति देता है। इसलिए जल से सींचता