भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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कां० ३, अ० ६, ब्रा० १, कं० १६-२७ शतपथब्राह्मण / ४४१ है ॥१६॥ इसको छुआकर (यजमान से) कहलवाता है- "ध्रुवोऽसि ध्रुवोऽयं यजमानोऽस्मिन्नायतने प्रजया भूयात्' (यजु० ५।२८) - "तू दृढ़ है। यह यजमान इस घर में प्रजा के साथ दृढ़ हो।" “पशुभिः" (यजु० ५।२८) - "पशुओं के साथ।" अर्थात् जैसी-जैसी कामना हो उसी की पूर्ति होती है ॥२०॥ अब स्रुवा में घी लेकर विष्ट (अर्थात् त्रिशूल के समान सिरे) पर डालता है, इस मन्त्रांश से- "घृतेन द्यावापृथिवी पूर्यथाम्” (यजु० ५।२८) - "द्यौ और पृथिवी घी से भर जायें।" इस प्रकार द्यौ और पृथिवी को ऊर्ज और रस से भर देता है। उनमें ऊर्ज और रस स्थापित कर देता है। यह सब प्रजा ऊर्ज और रसयुक्त द्यावा-पृथिवी पर ही निवास करती हैं ॥२१॥ अब चटाई (छदि) बिछाता है, यह पढ़कर- "इन्द्रस्य छदिरसि" (यजु० ५।२८) - "तू इन्द्र की चटाई है।" क्योंकि सदस् इन्द्र का है। "विश्वजनस्य छाया" (यजु० ५।२८) - "सब मनुष्यों के लिए आश्रय है।" क्योंकि इसमें सब गोत्रों के ब्राह्मण बैठते हैं। इसमें दो चटाइयाँ और जोड़ता है। फिर उनके उत्तर में तीन चटाइयाँ और उनके उत्तर में तीन और चटाइयाँ। इस प्रकार नौ हो जाती हैं। यह त्रिवृत् (तीन भागों वाला) होता है। नौ भी त्रिवृत् होता है। इसलिए नौ चटाइयाँ होती हैं ॥२२॥ सदस् का बांस (दक्षिण से) उत्तर को होता है, हविर्धान का पूर्व से पश्चिम को। हविर्धान पूरा-पूरा देवताओं का होता है, इसलिए वहाँ न खाते हैं न पीते हैं। अगर कोई उसमें खाय या पिये तो उसका सिर गिर जायगा। आग्नीध्र और सदस् दोनों में मिश्रित हैं (अर्थात् देव और मनुष्य दोनों में उनकी गिनती है)। इसलिए इनके साथ खाना-पीना होता है, क्योंकि इन दोनों की दोनों में गिनती है। मनुष्यों की दिशा उत्तर है, इसलिए सदस् का बांस उत्तर की ओर होता है ॥२३॥ इस मन्त्र को पढ़कर उसको घेरते हैं- "परि त्वा गिर्वणो गिरऽइमा भवन्तु विश्वतः। वृद्धायुमनु वृद्धयो जुष्टा भवन्तु जुष्टयः" (यजु० ५।२६, ऋ० १।१०।१२) -- "हे स्तुतियों को पसन्द करनेवाले ! स्तुतियां चारों ओर से तुझको घेर लें। वृद्धियाँ (उन्नतियाँ) बहुत आयुवाली हों। शक्तियां शक्तिवाली हों।" 'गिर्वा' का अर्थ है इन्द्र और 'गिरः' का जनसाधारण (विश)। इस प्रकार वह क्षत्रिय को जन-साधारण (विश) से घेरता है। इसलिए जन-साधारण से दोनों ओर क्षत्रिय घिरा रहता है ॥२४॥ अब वह सुई-डोरे से सीता है, यह मन्त्रांश पढ़कर - "इन्द्रस्य स्यूरसि" (यजु० ५।३०) - “तू इन्द्र की सुई है।" फिर गाँठ देता है इस मन्त्रांश को पढ़कर - "इन्द्रस्य ध्रुवोऽसि" (यजु० ५।३०) - "तू इन्द्र का ध्रुव है।" कहीं खुल न जाय। कार्य समाप्त होने पर खोल देता है। इस प्रकार अध्वर्यु या यजमान रोग-ग्रसित नहीं होते। कार्य की समाप्ति पर वह सदस् को छूता है, इस मन्त्रांश को पढ़कर - "ऐन्द्रमसि" (यजु० ५।३०) - "तू इन्द्र का है।" क्योंकि सदस् इन्द्र का ही होता है ॥२५॥ हविर्धानों में से पिछले को देखकर उत्तर की ओर आग्नीध्र शाला बनाता है। इसका आधा वेदी के भीतर होना चाहिए और आधा बाहर, या आधे से अधिक भीतर हो और आधे से कम बाहर, या सब भीतर ही हो। जब पूरा हो जाय तो इस मन्त्रांश से उसको छुए - "वैश्व- देवमसि" (यजु० ५।३०) - "तू सब देवों का है।" यह सब देवों का है ही, क्योंकि इससे पूर्व के दिन 'विश्वेदेवा' 'वसतीवरी' जलों के पास इसी में बैठते हैं (उप+वास करते हैं) ॥२६॥ एक बार यज्ञ करते हुए देवों को भय हुआ कि असुर राक्षस आक्रमण न करें। असुर

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