शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 467, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंकां० ३, अ० ६, ब्रा० २-३, कं० २६ व १-७ शतपथब्राह्मण / ४४६ रही। इसलिए वह इनको यहाँ यज्ञ में भाग देता है जिससे वे फलीभूत हो जायें। पशु मनुष्यों के पीछे हैं; चिड़ियाँ, ओषधियाँ और वनस्पतियाँ देवों के पीछे हैं। इस प्रकार यहाँ जो कुछ है, सभी को यज्ञ में भाग मिलता है। देव और मनुष्य दोनों पितरों के साथ पीते हैं। पहले यह प्रत्यक्ष रूप से पीते थे, अब परोक्ष रूप से पीते हैं ।।२६।। अध्याय ६—ब्राह्मण ३ जो दीक्षा लेता है वह सबको दीक्षित करता है। क्योंकि वह यज्ञ को दीक्षित करता है। यह यज्ञ ही सब-कुछ है। जिस यज्ञ के लिए उसने दीक्षा ली थी उसको समाप्त करके मानो वह सबको युक्त कर देता है ॥१॥ वैसर्जन आहुति इसलिये दी जाती है। चूंकि वह इस सब का विसर्जन करता है इसलिये इसका नाम वैसर्जन है। इसलिये जिस किसी ने व्रत लिया हो वह पीछे से (यजमान को) छुए। यदि कहीं जाना हो तो न सही। जब वह आहुति देता है तो सबका विसर्जन करता है ॥२॥ वैसर्जन आहुतियां क्यों दी जाती हैं ? यज्ञ विष्णु है। उस (विष्णु) ने देवों के लिए इस विक्रान्ति (शक्ति) को विचक्रमे अर्थात् प्राप्त किया, जो इस समय उनको प्राप्त है—पहले पद से इस (भूलोक) को, दूसरे से अन्तरिक्ष को, अन्तिम से द्युलोक को। इसी विक्रान्ति को यज्ञ यजमान के लिए प्राप्त कराता है जब यजमान यज्ञ करता है। इसीलिये वैसर्जन आहुतियां दी जाती हैं ॥३॥ तीसरे पहर वेदी में कुश रखकर, व्रत के दूध का आधा भाग यजमान और उसकी स्त्री को देकर शाला में आते हैं, समिधा को रखते हैं और उपयमनी को बनाते हैं। (अध्वर्यु) घी को (गार्हपत्य की) अग्नि पर रखता है। स्रुच् को मांजता है। यजमान सोम राजा को अपनी गोद में लेता है। अध्वर्यु सोम-गौ के पद की रेणु को गार्हपत्य के पीछे फेंकता है जिससे उसकी प्रतिष्ठा हो, क्योंकि पैरों से ही तो प्रतिष्ठा होती है (आदमी पैरों के बल ही खड़ा होता है) ॥४॥ कुछ लोग (इस रेणु के) चार भाग करते हैं। चौथाई भाग को उस उपयमनी में रखते हैं जहाँ से आहवनीय लेते हैं। चौथाई भाग अक्ष में लगाते हैं। चौथाई भाग को (अग्नीध्रीय अग्नि की) उपयमनी पर रखते हैं और एक-चौथाई को गार्हपत्य के पीछे फेंकते हैं ॥५॥ परन्तु ऐसा नहीं करना चाहिए। उसको बिल्कुल गार्हपत्य के पीछे ही फेंकना चाहिए। घी को साफ करके जुहू और उपभृत में चार चमचे लेता है—पृषदाज्य (जमे हुए घी) के पांच चमचे इस मन्त्र से—"ज्योतिरस विश्वरूपं विश्वेषां देवानाँ समित्" (यजु० ५।३५)—"तू विश्वरूप ज्योति है, सब देवताओं की समिधा या ज्वाला।" क्योंकि पृषदाज्य सब देवों का है। जब ईंधन प्रदीप्त हो जाता है तो स्रुचों को रखते हैं ॥६॥ अब वह आहुति देता है— "त्वं सोम तनूकृद्भ्यो द्वेषेभ्योऽन्यकृतेभ्यऽउरु यन्तासि वरूथँ स्वाहा" (यजु० ५।३५)—"हे सोम, तू शरीरों को कष्ट देनेवाले, दूसरों द्वारा किये हुए द्वेषों से बचानेवाला है। बहुत प्रकार से नियन्ता है। तू हमारे यज्ञरूपी घर की रक्षा कर।" इस प्रकार