भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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कां० ३, अ० ६, ब्रा० ३, कं० ७-१५ शतपथब्राह्मण / ४५१ वह इस पृथिवी पर प्रतिष्ठा लाभ करता है और इस लोक को प्राप्त करता है ॥७॥ अब वह अप्तु (अर्थात् तीव्रगामी सोम) के लिए दूसरी आहुति देता है—‘‘जुषाणोऽअप्तु- राज्यस्य वेतु स्वाहा’’ (यजु० ५।३५)—‘‘तेज सोम हमारे घी को स्वीकार करे।’’ उस (सोम) ने ही तो कहा था कि ‘मुझे राक्षसों से भय लगता है कि दुष्ट राक्षस मुझे मार्ग में हानि न पहुँचावें। इसलिए मुझे छोटा करके ले चलो कि मैं उनके वध के लिए अति सूक्ष्म हो जाऊँ। मुझे बूँद के रूप में ले चलो।’ क्योंकि बूँद अप्तु अर्थात् तेज होती हैं, इसलिए वध के लिए अतिसूक्ष्म करके वह राक्षसों के डर से उसको बूँद के रूप में लेते हैं क्योंकि बूँद तेज होती है। इसीलिए वह तेज सोम के लिए दूसरी आहुति देता है ॥८॥ वे जलती हुई समिधा को उठाते हैं और उपयमनी पर रखते हैं। तब वह होता से कहता है—‘लिये जाती हुई अग्नि के लिए मन्त्र बोल।’ या ‘लिये जाते हुए सोम के लिए।’ परन्तु ऐसा कहना चाहिए कि ‘लिये जाती हुई अग्नि के लिए’ ॥६॥ अब वह (सोम कुचलने के) पत्थरों को, द्रोण कलश को, वायव्यों को (लकड़ी की कूँडियों को ‘वायव्य’ कहते हैं), (बीस) समिधाओं को, कार्ष्मण्य लकड़ी की परिधियों को, अश्वबाल घास के प्रस्तरों को, ईख की विधृतियों को लेता है। कुश को उससे बाँधते हैं। दो वपाश्रपणी (कार्ष्मण्य लकड़ी की शलाकायें जिन पर भूनते हैं), दो रस्सियां, दो अरणी, अधि- मन्थन लकड़ी, दो वृषण इन सबको लेकर वे आगे (आग्नीध्र तक) जाते हैं। इस प्रकार यज्ञ ऊँचा उठता है ॥१०॥ जब वे आगे चलते हैं तो वह (यजमान से) यह बँचवाता है—‘‘अग्ने नय सुपथा रायेऽ- अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्। युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम’’ (यजु० ५।३६, ऋ० १।१६६।१)—‘हे अग्नि देव, जो तू सब कर्मों को जानता है, हमको धन के लिए ठीक मार्ग पर चला। हमको बहकानेवाले पाप से बचा। हम तेरी बहुत प्रार्थना करते हैं।’ इस प्रकार वह अग्नि को आगे करता है। अग्नि ही दुष्ट राक्षसों को मारती चलती है। वे उसको भय-रहित और हानि-रहित मार्ग से ले जाते हैं। वे चलते हैं और आग्नीध्र तक पहुँचते हैं, और अध्वर्यु आग्नीध्र कुण्ड में अग्नि रख देता है ॥११॥ अब वह रखकर आहुति देता है इस मन्त्र से—‘‘अयं नोऽअग्निर्वरिवस्कृणोत्वयं मृधः पुर ऽएतुप्रभिन्दन्। अयं वाजान् जयतु वाजसातावयं॒ शत्रून् जयतु जर्हृ॑षाणः स्वाहा’’ (यजुर्वेद ५।३७)—‘‘यह अग्नि हमारे लिए चौड़ा मार्ग बनावे। संग्रामों को भेदता हुआ आगे चले। अन्न- सेवन में यह अन्नों को जीते, वेग से आगे बढ़कर वह शत्रुओं को जीते।‘’ इसके द्वारा वह अन्तरिक्ष में प्रतिष्ठा को प्राप्त करता है और उस लोक को प्राप्त करता है ॥१२॥ वे सोम कुचलने के पत्थरों, द्रोण कलश और वायव्यों को उसी स्थान पर रख देते हैं; और चीजों को लेकर वे आगे चलते हैं और आहवनीय के उत्तर में रख देते हैं ॥१३॥ अध्वर्यु प्रोक्षणी को लेता है। पहले समिधा पर जल छिड़कता है, फिर वेदी पर। तब वे उसको कुश दे देते हैं। वह (इस कुश) को इस प्रकार रखता है कि गांठ पूर्व की ओर रहे। तब उस पर जल छिड़कता है। जो जल बचा उसे कुशों की जड़ पर छिड़ककर और गांठ को खोल- कर अश्वबाल घास के प्रस्तर को कुश से बाँधकर वह उसको लेता है और प्रस्तर को लेकर कुशा की एक तह बिछा देता है। कुश को बिछाने के पश्चात् कार्ष्मय की परिधियों को आग पर रखता है। परिधियों को रखकर दो समिधाओं को रखता है और दो समिधाओं को रखकर—॥१४॥ इस मन्त्र से आहुति देता है—‘‘उरु विष्णो विक्रमस्वोरु क्षयाय नस्कृधि। घृतं घृतयोने