भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

पृष्ठ 497, कुल 699 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 497

कां० ३, अ० ८, ब्रा० १-२, कं० १५-१६ व १-६ शतपथब्राह्मण / ४७६ पीछे से; यह पितरों की विधि है। या तो उसका मुंह बन्द करके घोंट देते हैं या फन्दा डाल देते हैं। इसलिए ऐसा नहीं कहते 'इसको मार।' यह तो मनुष्यों की भाषा है। किन्तु कहते हैं 'संज्ञपय, अन्वगन्' (इसको शान्त कर दे। यह चला गया)। यह देवों की भाषा है। जब कहते हैं कि 'अन्वगन्' (चला गया) तो यजमान देवों के पास चला जाता है। इसलिए कहते हैं 'अन्वगन्' (चला गया) ॥१५॥ जब ये इसको पकड़कर नीचे गिरा लेते हैं तो संज्ञपन (गला घोंटने) से पहले आहुति देते हैं “स्वाहा देवेभ्यः” (यजु० ६।११)। जब मारनेवाला कहता है 'संज्ञप्तः पशुः' (अर्थात् पशु शान्त हो गया) तो एक आहुति देते हैं-“देवेभ्यः स्वाहा” (यजु० ६।११)। इस प्रकार कुछ देवों के पहले 'स्वाहा' कहा जाता है और कुछ के पीछे। इस प्रकार इन सबको प्रसन्न करता है। इस प्रकार दोनों प्रकार के देव प्रसन्न होकर उसको स्वर्गलोक को ले जाते हैं। ये 'परिपशव्य' आहुतियां हैं। चाहे तो इनकी आहुति दे, चाहे न दे। यदि इच्छा हो तो इनका आदर न करे ॥१६॥ अध्याय ८—ब्राह्मण २ जब घातक ने कहा कि पशु शान्त हो गया तो अध्वर्यु कहता है 'नेष्टा पत्नी को ला।' तब नेष्टा पत्नी को लाता है। उसके हाथ में पैर धोने के लिए पात्र में जल होता है ॥१॥ अब वह उस पत्नी से कहलवाता है—"नमस्तऽआतान" (यजु० ६।१२) - "हे फैले हुए, तुझे नमस्कार हो।" 'फैला हुआ' यज्ञ है क्योंकि यज्ञ फैलाया जाता है, इसलिए यज्ञ का नाम 'आतान' है। यह जो पत्नी है, वह यज्ञ का पिछला अर्द्धभाग है। उसको यज्ञ को प्रसन्न करने के हेतु आगे की ओर बुलाता है। इस प्रकार वह यज्ञ की त्रुटि को पूरा करती है, और यज्ञ उसकी हानि नहीं करता। इसलिए कहा 'यज्ञ, तुझे नमस्कार हो' ॥२॥ “अनर्वा प्रेहि” (यजु० ६।१२) - अर्थात् "स्वच्छ चल।" - "घृतस्य कुल्याऽउपऽऋतस्य पन्थाऽअनु” (यजु० ६।१२) - "घी की नदियों में या सत्यता की गलियों में।" अर्थात् कल्याण- मार्गों में जा। “देवीरापः शुद्धा वोढ्वं, सुपरिविष्टा देवेषु सुपरिविष्टा वयं परिवेष्टारो भूयास्म” (यजु० ६।१३) - "हे दैवी जलो ! भलीभांति तैयार होकर तुम देवों को प्राप्त होओ। हम भलीभांति तैयार हो जावें।" इस प्रकार वह जल को पवित्र करती है ॥३॥ अब पत्नी पशु के प्राणों को जलों से स्पर्श करती है। वह प्राणों को जलों से इसलिए स्पर्श करती है कि देवों की हवि जीव है—अमृतों की अमृत। संज्ञपन में पशु को मारते हैं। जल प्राण है, इस प्रकार इसमें प्राणों को धारण कराती है। इस प्रकार 'देवों' का हवि जीव हो जाता है—अमृतों का अमृत ॥४॥ पत्नी क्यों स्पर्श करती है ? पत्नी स्त्री है। स्त्री से ही प्रजा उत्पन्न होती है। इसको इस प्रजा को स्त्री से उत्पन्न कराता है, इसलिए पत्नी ही इसका स्पर्श करती है ॥५॥ वह इस प्रकार स्पर्श करती है—"वाचं ते शुन्धामि” से मुख को (यजु० ६।१४)। “प्राणं ते शुन्धामि” से नासिका को। “चक्षुस्ते शुन्धामि” से आँखों को। “श्रोत्रं ते शुन्धामि” से कानों को। "नाभिं ते शुन्धामि" से अस्पष्ट प्राण को। "मेढ्रं ते शुन्धामि" या "पायुं ते शुन्धामि" से