शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 499, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंका० ३, अ० ८, ब्रा० २, कं० ६-१५ शतपथब्राह्मण / ४८१ पीछे के प्राण को। इस प्रकार वह प्राणों को धारण कराती है अर्थात् उसको फिर जीवन देती है। “चरित्राँस्ते शुन्धामि” से पैरों को। पैरों पर खड़ा होता है अतः पैरों पर उसको खड़ा करती है, प्रतिष्ठा के लिए ॥६॥ अब जो जल बच रहे उससे या उसके आधे से अध्वर्यु और यजमान उसको स्पर्श करते हैं। सिर से लेकर। इस प्रकार वे उसमें प्राण धारण कराते हैं और उसको पुनर्जीवित करते हैं ॥७॥ इस प्रकार जहाँ कहीं वे उसको घाव लगाते हैं, वहाँ जलों से शान्ति दिलाते हैं। शान्ति- दायक जलों से शान्ति दिलाते हैं। वे उसको जलों से चंगा करते हैं ॥८॥ इन मन्त्रों से स्पर्श करते हैं— “मनस्तऽआप्यायतां वाक्तऽआप्यायतां प्राणस्तऽआप्यायतां चक्षुस्तऽआप्यायताᳪ श्रोत्रं तऽआप्यायताम्” (यजु० ६।१५)— “तेरा मन चंगा हो, तेरी वाणी चंगी हो, तेरे प्राण चंगे हों, तेरी आँखें चंगी हों, तेरे कान चंगे हों।” इस प्रकार वे इसमें प्राण धारण कराते हैं— “यत्ते क्रूरं यदास्थितं तत्तऽआप्यायतां निष्प्यायतां” (यजु० ६।१५)— “जो कुछ तेरा घाव हो, जो तुझे क्षति हो, वह सब पूरी हो जाय और तू मजबूत हो जा” ॥६॥ इस प्रकार जो कुछ घाव लगाते हैं, जहाँ कहीं चोट लगाते हैं, वहाँ शान्तिदायक जलों के द्वारा उसको चंगा कर देते हैं। उसको वे ठीक कर देते हैं। “तत्ते शुध्यतु” (यजु० ६।१५)— “इस प्रकार वे उसे शुद्ध करते हैं।” “शमहोभ्यः” (यजु० ६।१५)— “तेरे दिन कल्याणकर हों।” इससे जो जल बचता है उसको पशु के पिछले भाग में डाल देते हैं ॥१०॥ इस प्रकार जहाँ घाव करते हैं या जहाँ चोट पहुँचाते हैं वहाँ ‘शमहोभ्यः’ से जल को पशु के पिछले भाग में डाल देते हैं कि कहीं रात-दिन अहितकर न हो जायें ॥११॥ अब वे पशु को उलटा लिटा देते हैं। अब अध्वर्यु उसके ऊपर कुश रखता है, “ओषधे त्रायस्व” (यजु० ६।१५) से। असि वज्र है। इस प्रकार वह वज्र उस पशु को नहीं सताता। और असि को उसमें लगाता है, “स्वधिते मैनँ॒ हिँ॒सीः” (यजु० ६।१५)— “हे छुरा, तू इसको न सता। असि वज्र है।” इस प्रकार यह वज्र (असि) उसको हानि नहीं पहुँचाता ॥१२॥ जो प्रज्ञातधार है उसका प्रयोग करता है क्योंकि यजुः पढ़कर वह पवित्र की जा चुकी है। कुशा का जो अग्रभाग है उसे बायें हाथ में रखता है और जो नीचे का भाग है उसे दाहिने हाथ में ॥१३॥ जहाँ चमड़ा उचेला जाय या रक्त निकले वहाँ दोनों ओर से इसके नीचे के भाग में रुधिर लगा देता है, इस मन्त्र से— “रक्षसां भागोऽसि” (यजु० ६।१६)— “तू राक्षसों का भाग है।” यह जो रुधिर (असृक्) है वह राक्षसों का ही भाग है ॥१४॥ उसको फेंककर उस पर चढ़ता है— “इदमहँ॒ रक्षोऽभितिष्ठामीदमहँ॒ रक्षोऽबबाधऽइदम- हँ॒ रक्षोऽधमं तमो नयामि” (यजु० ६।१६)— “यह मैं राक्षसों को कुचलता हूँ। यह मैं राक्षसों को निकालता हूँ। यह मैं राक्षसों को सबसे निकृष्ट अँधेरे को प्राप्त कराता हूँ।” यज्ञ के द्वारा ही वह राक्षसों को निकाल भगाता है। यह कुश मूलरहित और दोनों ओर से कटा इसलिए रहता है कि राक्षस भी तो मूलरहित, दोनों ओर से परिच्छिन्न, अन्तरिक्ष में विचरा करता है, जैसे इस लोक में मनुष्य मूलरहित और दोनों ओर से परिच्छिन्न विचरता है; इसीलिए यह कुश मूलरहित होता है और दोनों ओर से परिच्छिन्न होता है ॥१५॥