शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 513, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंकां० ३, अ० ८, ब्रा० ३-४, कं० ३७ व १-१० शतपथब्राह्मण / ४९५ “देव त्वष्टर्भूरि ते संँ समेतु सलक्ष्मा यद् विषुरूपं भवाति” (यजु० ६।२०)—“हे त्वष्टा देव, तेरी शक्ति संयुक्त हो जिससे जो अलग-अलग रूप की चीज है वह एकरूप हो जाय।” इस प्रकार वह इसको पूरा चारों ओर से घेर देता है। “देवत्रा यन्तमवसे सखायोऽनु त्वा माता पितरो मदन्तु” (यजु० ६।२०)—“तेरे सखा, माता-पिता, देवलोक में जाते हुए तुझसे प्रसन्न हों।” जहाँ-जहाँ इसके अंगों की आहुति दी है वहाँ-वहाँ इसको पूरा करके समन्वय करता है जिससे परलोक में उसको पूरा शरीर मिले ॥३७॥ अध्याय ८—ब्राह्मण ४ पशुयाग में ग्यारह-ग्यारह के तीन होते हैं—ग्यारह प्रयाज, ग्यारह अनुयाज और ग्यारह उपयाज। दस हाथ की अंगुलियाँ, दस पैर की, दस प्राण, प्राण, व्यान और उदान। इतने मिल- कर पुरुष होता है जो पशुओं में सबसे श्रेष्ठ है और पशु जिसके पीछे हैं ॥१॥ इस पर कहते हैं कि यज्ञ में क्या किया जाता है जिससे प्राण सब अंगों के लिए कल्याण- कारी हो ॥२॥ गुदा के तीन भाग करता है। गुदा प्राण है (प्राण निकलने का स्थान है)। वहाँ से यह (पशु) फैलता है और यह प्राण उसका संचार करता है ॥३॥ वह गुदा के तीन भाग करता है—एक-तिहाई उपयाज, एक-तिहाई जुहू में और एक- तिहाई उपभृत् में। इस प्रकार प्राण सब अंगों के लिए कल्याणकारी होता है ॥४॥ केवल वही पशु का आलभन करे जो उसे मेध्ययुक्त कर सकता हो। यदि दुबला हो तो जो कुछ चर्बी बची वह गुदा में भर दे। गुदा प्राण है। वहाँ से यह (पशु) फैलता है और यह प्राण उसका संचार करता है। प्राण ही पशु है। जब तक प्राण रहता है तब तक वह पशु है। जब उससे प्राण निकल जाता है तो लकड़ी के समान वह व्यर्थ पड़ा रहता है ॥५॥ गुदा पशु है। चर्बी मेध है। इसमें मेध देता है। यदि यह पतली हो तो स्वयं ही मेध हो जाता है ॥६॥ अब पृषदाज्य को लेता है। यह दो प्रकार का है, घी भी और दही भी। द्वन्द्व का नाम है जोड़ा। प्रजनन का नाम भी जोड़ा है। इस प्रकार प्रजनन करता है ॥७॥ उससे अनुयाज में काम लेता है। पशु अनुयाज हैं। पृषदाज्य दूध है। इस प्रकार वह पशुओं में दूध धारण कराता है और इस प्रकार पशुओं में दूध रखा जाता है। प्राण पृषदाज्य है। अन्न पृषदाज्य है। अन्न प्राण है ॥८॥ इनको अनुयाज, में आहवनीय के सम्मुख काम में लाता है। इस प्रकार यह जो आगे प्राण है उसको (पशु में) रखता है। (प्रतिप्रस्थाता) इसी से पीछे की ओर उपयाज करता है। इसके द्वारा यह जो पीछे प्राण है उसको (पशु में) धारण कराता है। इस प्रकार दो प्राणों की प्रतिष्ठा होती है, एक ऊपर, दूसरी नीचे ॥६॥ यह एक (होता) दो के लिए वषट्कार करता है—एक तो अध्वर्यु के लिए और दूसरे उसके लिए जो उपयाज करता है (अर्थात् प्रतिप्रस्थाता के लिए)। और चूंकि यजन के बाद दी जाती है इसलिए इसका नाम उपयाज है। उपयाज करने में पीछे से उत्पत्ति होती है। स्त्रियों के