शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 521, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंकां० ३, अ० ६, ब्रा० १, कं० १३-२५ शतपथब्राह्मण / ५०३ 'सब' के द्वारा अपने को पूर्ण करता है। सब उसके पास लौट आते हैं और सबको वह अपने अनुकूल कर लेता है ॥१३॥ यह बृहस्पति के पीछे क्यों होता है ? बृहस्पति ब्रह्म है। यह सब विश्वेदेव हैं। वह ब्रह्म को इन सबका मुख बनाता है। इसी से ब्राह्मण सबका मुख है ॥१४॥ अब इन्द्र के लिए। इन्द्र का अर्थ है शक्ति, वीर्य। इसी शक्ति तथा वीर्य के द्वारा प्रजापति ने अपने को पूर्ण किया। यही शक्ति या वीर्य उसके पास लौट आया। इसी शक्ति या वीर्य को उसने अपने अनुकूल बनाया। यह भी शक्ति या वीर्य के द्वारा अपने को पूर्ण करता है। यह शक्ति या वीर्य उसके पास लौट आता है और वह उसको अपने अनुकूल बना लेता है ॥१५॥ यह विश्वेदेवों के पीछे क्यों होता है ? इन्द्र क्षत्रिय है। विश्वेदेव वैश्य हैं। इस प्रकार वह अन्न को सामने रखता है ॥१६॥ अब मरुत् के लिए। मरुत् वैश्य है। वैश्य का अर्थ है भूमः या बहुतायत। बहुतायत (भूमः) से ही प्रजापति ने तब अपने-आपको पूर्ण किया। बहुतायत उसके पास लौट आई। बहुतायत को उसने अपने अनुकूल बना लिया। इसी प्रकार वह भी बहुतायत से अपने को पूर्ण करता है। बहुतायत उसके पास लौट आती है। बहुतायत को अपने अनुकूल बना लेता है ॥१७॥ वह इन्द्र के पीछे क्यों होता है ? इन्द्र क्षत्रिय है, विश्वेदेव वैश्य हैं, मरुत् वैश्य हैं। इस प्रकार वैश्यों से क्षत्रिय की रक्षा होती है। यह क्षत्रिय दोनों ओर से वैश्यों के द्वारा सुरक्षित है ॥१८॥ अब इन्द्राग्नी के लिए। अग्नि तेज है। इन्द्र वीर्य है। इन दोनों शक्तियों के द्वारा प्रजापति ने अपने को पूर्ण किया। दोनों शक्तियाँ उसके पास आईं। उन दोनों शक्तियों को उसने अपने अनुकूल बनाया। यह भी इन दोनों शक्तियों द्वारा अपने को पूर्ण करता है। ये दोनों शक्तियाँ उसके पास लौट आती हैं और वह दोनों को अपने अनुकूल कर लेता है ॥१९॥ अब सविता के लिए। सविता देवों का प्रेरक है। इस प्रकार सविता से प्रसवित होकर उसकी सब कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं ॥२०॥ अन्त में वह वरुण के लिए (पशु का) आलभन करता है। वह इसको वरुण के सब पाशों से और सब पापों से मुक्त कर देता है ॥२१॥ इसलिए यदि ग्यारह यूप हों तो अग्निवाले पशु को अग्नि के सामनेवाले यूप से बाँधे। अन्य सब को इसी प्रकार क्रमशः ॥२२॥ यदि ग्यारह पशु हों तो अग्निवाले पशु को यूप में आलभन करे। अन्यों को इसी प्रकार क्रमशः ॥२३॥ जब उनको उत्तर की ओर ले जाते हैं तो अग्निवाले को पहले ले जाते हैं, फिर औरों को इसी क्रम से ॥२४॥ जब उनको पहले गिराते हैं, तो अग्निवाले को पहले दक्षिण की ओर गिराते हैं। औरों