भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

पृष्ठ 523, कुल 699 में से

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कां० ३, अ० ६, ब्रा० १-२, क० २५-२७ व १-६ शतपथब्राह्मण / ५०५ को उत्तर की ओर ले जाते हुए उसी क्रम से ॥२५॥ अब उनकी वपा की आहुति देते हैं तो पहले अग्नि की, फिर औरों की उसी क्रम से ॥२६॥ जब उनसे अन्य आहुतियां देते हैं तो पहले अग्निवाले से । फिर औरों से उसी क्रम से ॥२७॥ अध्याय ६-ब्राह्मण २ जब यज्ञ का शिर काट दिया गया तो उसका रस बहकर जलों में मिल गया । इसी रस के कारण वे जल बहते हैं। यह माना जाता है कि वही रस बहता है ॥१॥ जब वह वसतीवरी जल के पास जाता है तो इसी रस को लाकर यज्ञ में रखता है और यज्ञ को रसयुक्त करता है । इसलिए वह वसतीवरी जल के पास जाता है ॥२॥ उनको वह सब सवनों में बाँट देता है । इससे वह सब सवनों में रस को धारण करता है । सब सवनों को रसयुक्त करता है । इसलिए सब सवनों में उसे बाँटता है ॥३॥ उसको वह बहते हुए में से लेवे । चूंकि यज्ञ का रस बह रहा था, इसलिए उसे बहते हुए जलों में से लेना चाहिए ॥४॥ इनको रक्षा के लिए लेते हैं। इस संसार में जो कुछ है वे सब आराम लेते हैं, यहाँ तक कि यह वायु भी जो चलता है । परन्तु जल आराम नहीं लेते, इसलिए इन बहते हुए जलों में से ही लेवे ॥५॥ इन (जलों) को दिन में लेना चाहिए, यह सोचकर कि यज्ञ के रस को देखकर ग्रहण करूँ । इसलिए इनको दिन में लेना चाहिए । यह जो तपता है (अर्थात् सूर्य) उसी के लिए इनका ग्रहण करता है, क्योंकि विश्वेदेवों के लिए ग्रहण करता है । उसकी किरणें ही विश्वेदेव हैं। इसलिए दिन में ग्रहण करना चाहिए । वह (सूर्य) केवल दिन में ही (उदय होता है) इसलिए दिन में ही ग्रहण करना चाहिए ॥६॥ विश्वेदेव यजमान के घर आते हैं। यदि वसतीवरी जलों को सूर्यास्त से पहले ग्रहण करता है तो यह सर्वथा ऐसा ही है कि जैसे कोई बड़ा (मान्य) आवे तो वह उसे अपने घर को शुद्ध करके स्वागत करे। ऐसा ही यह है। ये देव हवि के पास आते हैं और उन वसतीवरी जलों में प्रविष्ट हो जाते हैं। यही उपवसथ कहलाता है ॥७॥ यदि कोई इन जलों को लेने में सूर्यास्त कर दे तो प्रायश्चित्त किया जाता है। यदि उस पुरुष ने पहले (सोम) यज्ञ किया हो तो उसी के घड़े (निनाह्य) से ले लेना चाहिए। क्योंकि उसके जल सूर्यास्त से पहले ही के लिए होते हैं। यदि उसने पहले सोमयज्ञ न किया हो तो यदि उसके पास या पड़ोस में कोई और पुरुष हो जिसने यज्ञ किया हो तो उसी के घड़े से लेवे, क्योंकि उसके जल भी सूर्यास्त से पहले ही ग्रहण किये हुए होते हैं ॥८॥ अगर ये दोनों न मिलें तो एक जलती लकड़ी लेकर उन जलों के ऊपर दिखाकर ग्रहण करे । वह स्वर्ण को ऊपर दिखाकर ग्रहण करे । इससे उसी का रूप हो जाता है जो ऊपर तपता है । (अर्थात् जलती लकड़ी या सोने का टुकड़ा सूर्य के बराबर हो जाता है) ॥६॥ इन जलों को इस मन्त्र से लेता है—

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