भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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का० ३, अ० ६, ब्रा० ३, कं० १-६ शतपथब्राह्मण / ५०६ अध्याय ६-ब्राह्मण ३ उन (ऋत्विजों) को जगाते हैं। वे जलों को छूकर आग्नीध्र में जाते हैं और आज्यों को ग्रहण करते हैं। आज्यों को लेकर वे (वेदि पर) जाते हैं। आज्यों को रखकर-॥१॥ सोम राजा को उतारता है। यह पृथिवी इन प्रजाओं की प्रतिष्ठा और जन्म-स्थान है। वह राजा (सोम) को इसी प्रतिष्ठा में उतारता है। उसी पर फैलाता है। उसी मे उत्पन्न करता है ॥२॥ वह गाड़ी के जुओं के बीच में उसको उतारता है। गाड़ी यज्ञ (का साधन) है। इस प्रकार वह उसको यज्ञ से बाहर नहीं करता। वह उस (सोम) को उन पत्थरों पर रखता है जो एक-दूसरे के सम्मुख होते हैं। सोम क्षत्रिय है, पत्थर वैश्य है। इस प्रकार वह क्षत्रिय को वैश्य के ऊपर रखता है। पत्थर एक-दूसरे के सम्मुख क्यों होते हैं? इसलिए कि वह वैश्यों को एक-मुख होकर क्षत्रियों के सामने विवाद-रहित करता है। इसलिए पत्थर एक-दूसरे के सम्मुख होते हैं ॥३॥ वह (सोम को) इस मन्त्र से उतारता है- "हृदे त्वा मनसे त्वा" (यजु० ६।२५)- “हृदय के लिए तुझको, मन के लिए तुझको।" अर्थात् यजमान की कामना के लिए। यजमान हृदय और मन से कामना करता है। कामना करके ही यज्ञ करता है इसलिए कि 'हृदय के लिए तुझको, मन के लिए तुझको' ॥४॥ "दिवे त्वा सूर्याय त्वा" (यजु० ६।२५)- "अर्थात् तुझको देवलोक के लिए, तुझको सूर्यलोक के लिए।" जब वह कहता है 'दिवे त्वा सूर्याय त्वा' तो आशय होता है 'देवों के लिए'। “ऊर्ध्वमिममध्वरं दिवि देवेषु होत्रा यच्छ" (यजु० ६।२५) - 'अध्वर' कहते हैं यज्ञ को। इसका तात्पर्य यह है कि “तू इस यज्ञ को और हवन को द्यौलोक में ऊपर देवों के लिए ले जा" ॥५॥ “सोम राजन् विश्वास्त्वं प्रजाऽउपावरोह" (यजु० ६।२६) - "हे सोम राजा, तू इस सब प्रजा पर उतर।" वह इस राजा को प्रजाओं के आधिपत्य और राज्य के लिए नीचे उतारता है ॥६॥ उसको रखकर उसके पास बैठ जाता है- "विश्वास्त्वां प्रजाऽउपावरोहन्तु" (यजु० ६।२६)- “सब प्रजाएँ तुझ तक उतरें।" यह जो उसने कहा कि 'तू सब प्रजा तक उतर' यह अनुचित था, क्योंकि सोम क्षत्रिय है। इस प्रकार बुरे-भले मिल गये। इसीलिए तो आज भी बुरे- भले मिल जाते हैं। यह जो कहा कि 'प्रजाएं तुझ तक उतरें' यह ठीक है, क्योंकि वैश्य लोग क्षत्रिय के सामने आकर झुकते हैं, अर्थात् सिर झुकाते हैं। पास बैठकर होता प्रातःकालीन अनुवाक पढ़ना आरम्भ करता है ॥७॥ अब समिधा को चढ़ाकर वह कहता है- 'प्रातःकाल आनेवाले देवों के लिए अनुवाक कह।' प्रातः आनेवाले देव छन्द हैं, जैसे कि अनुयाज भी छन्द हैं। अनुयाज यह कहकर किये जाते हैं- 'देवों के लिए भेजो, देवों के लिए यजन करो' ॥८॥ कुछ लोग कहते हैं 'देवों के लिए अनुवाक कहो।' ऐसा न कहना चाहिए। प्रातः आने- वाले देव छन्द हैं, और अनुयाज किये जाते हैं यह कहकर कि 'देवों के लिए भेजो, देवों के लिए यजन करो।' इसलिए कहना चाहिए कि 'प्रातःकाल आनेवाले देवों के लिए अनुवाक कह' ॥६॥