भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

पृष्ठ 529, कुल 699 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 529

का० ३, अ० ६, ब्रा० ३, क० १०-१६ शतपथब्राह्मण / ५११ जब वह समिधा रखता है तो इससे छन्दों को उत्तेजित करता है। और जब होता प्रातः- अनुवाक को कहता है उससे भी वह छन्दों को ही पुष्ट और पूर्ण करता है। देव छन्दों के द्वारा ही स्वर्गलोक को गये, इसलिए छन्द अपूर्ण हो गये, क्योंकि अब न तो स्तुति होती है न प्रशंसा। इसलिए अब वह छन्दों को पूर्ण करता है। और इन्हीं पूर्ण छन्दों से यज्ञ को करता है और होता अनुवाक पढ़ता है ॥१०॥ इस पर कुछ लोगों का कहना है कि 'प्रातरनुवाक का प्रतिगर या फल क्या है?' अध्वर्यु को जागते हुए उपासना करनी चाहिए और जब वह निमेष ले, वही उसका प्रतिगर है। परन्तु ऐसा न करना चाहिए। यदि नींद आ जाय तो सो जाय। जब होता प्रातः-अनुवाक को समाप्त करता है तब प्रचरणी आहुति दी जाती है। स्रुक् में चार बार आज्य लेकर आहुति देता है ॥११॥ जब यज्ञ का सिर काटा गया तो रस जलों में मिल गया। उसको गत दिवस वसतीवरी जलों के द्वारा लाये थे। अब जो कुछ रस बच गया उसको इसके द्वारा लाते हैं ॥१२॥ जब वह उस आहुति को देता है तो इसको यज्ञ के रस के लिए देता है। उस रस को अपनी ओर खींचता है। जिन देवताओं के लिए आहुति देता है उन्हीं को प्रसन्न करता है। इस प्रकार तृप्त होकर ये देवते यज्ञ के रस को इसके लिए दिलाते हैं ॥१३॥ वह इस मन्त्र से आहुति देता है- "शृणोत्वग्निः समिधा हवं मे" (यजु० ६।२६) इसका अर्थ है कि "अग्नि समिधा द्वारा मेरी स्तुति सुने या स्वीकार करे।" "शृण्वन्त्वापो धिषणाश्च देवीः" अर्थात् "दिव्य गुणयुक्त जल और धिष्ण हमारी स्तुति सुनें।" "श्रोता ग्रावाणो विदुषो न यज्ञम्" (यजु० ६।२६) अर्थात् "यज्ञ को जाननेवाले ग्रावा (पत्थर के तुल्य दृढ़ गुरुजन) इस मेरी स्तुति को सुनें या स्वीकार करें।" 'विदुषः' इसलिए कहा कि यह ग्रावा विद्वान् है। "शृणोतु देवः सविता हवं मे स्वाहा" (यजु० ६।२५) अर्थात् "सविता देव मेरी इस स्तुति को स्वीकार करे।" सविता देवों का प्रेरक है। सविता की ही प्रेरणा से वह यज्ञ के रस की इच्छा करता है ॥१४॥ फिर चार चमसों में घी को लेकर उत्तर की ओर जाकर कहता है, 'हे होता, जलों को बुलाओ।' या 'जलों की इच्छा करो।' होता ऐसा क्यों कहता है ? इसका कारण यह है कि इसी आहुति के द्वारा अध्वर्यु घी को यज्ञ के रस में डालता है और अपनी ओर खींचता है। और होता (एकधन) ग्रहों के पास खड़ा रहता है कि दुष्ट राक्षस उसको सता न सकें ॥१५॥ अब अध्वर्यु आदेश देता है-'हे मित्रावरुण के चमसा रखनेवाले, आओ। नेष्टा, पत्नियों