शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 537, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंका० ३, अं० ६, ब्रा० ४, कं० ५-११ शतपथब्राह्मण / ५१६ रीति से बनाया गया ।" यज्ञ का देवता इन्द्र है इसलिए कहा 'इन्द्र के लिए' । “उत्तमेन पविना" (यजु० ६।३०) - सोम सबसे अच्छा वज्र (पवि) है, इसलिए कहा 'उत्तम वज्र से'। “ऊर्जस्वन्तं मधुमन्तं पयस्वन्तम्” (यजु० ६।३०) - इसके कहने का तात्पर्य कि "रस वाला” ॥५॥ अब वाणी को रोक लेता है (चुप हो जाता है) । यज्ञ को करते हुए देव लोग राक्षसों के आक्रमण से भयभीत हो गये । उन्होंने कहा, 'चुपके-चुपके यज्ञ करें। वाणी को रोक लें।' उन्होंने चुपके-चुपके आहुति दी और वाणी को रोक लिया । ६।। अब निग्राभ्य जलों को लेता और उन पर यह जपता है—"निग्राभ्या स्थ देवश्रुतस्तर्प- यत मा । (यजु० ६।३०) मनो मे तर्पयत, वाचं मे तर्पयत, प्राणं मे तर्पयत, चक्षुर्मे तर्पयत, श्रोत्रं मे तर्पयतात्मानं मे तर्पयत, प्रजां मे तर्पयत, पशून्मे तर्पयत, गणान्मे तर्पयत, गण मे मा वितृषन्' (यजु० ६।३१) - "हे जलो ! तुम देवश्रुत निग्राभ्य हो। मुझे तृप्त करो, मेरे मन को तृप्त करो, मेरी वाणी को तृप्त करो, मेरे प्राण को तृप्त करो, मेरी आँख को तृप्त करो, मेरे कान को तृप्त करो, मेरे आत्मा को तृप्त करो, मेरी प्रजा को तृप्त करो, मेरे पशुओं को तृप्त करो, मेरे गणों को तृप्त करो, मेरे गण प्यास से न मरें।” जल रस हैं। उन पर आशीर्वाद कहता है कि मुझ सम्पूर्ण को तृप्त करो - प्रजा को, पशु को, गणों को; मेरे गण प्यासे न मरें। यह उपांशुसवन ही आदित्य विवस्वान् है। यह वस्तुतः इस यज्ञ का ग्यान है ॥७॥ अब वह उसको नापता है। ये जो उसको कुचलते हैं तो मानो उसका हनन करते हैं। वहीं से यह उठता है, जीता है। चूंकि उससे नापते हैं इसलिए नाप होती है—जो मनुष्यों में प्रचलित है वह भी और अन्य नाप (मात्रा) भी ॥८॥ वह इस मन्त्र से नापता है—"इन्द्राय त्वा वसुमते रुद्रवते" (यजु० ६।३२)- "यह वसुवाले और रुद्रवाले इन्द्र के लिए।" यज्ञ का देवता इन्द्र है, इसलिए कहा 'इन्द्र के लिए।' 'वसुवाले और रुद्रवाले' कहकर वह इन्द्र के साथ वसु और रुद्रों का भी भाग स्थापित कर देता है। "इन्द्राय त्वादित्यवते" (यजु० ६।३२) - इससे इन्द्र के साथ आदित्यों का भाग भी स्थापित कर देता है। "इन्द्राय त्वाभिमातिघ्ने" (यजु० ६।३२) - 'अभिमाति' का अर्थ है शत्रु, अर्थात् “शत्रु के मारनेवाले इन्द्र के लिए।" यह उस (इन्द्र) का विशेष भाग है जैसे किसी श्रेष्ठ (नेता) का होता है, - अन्य देवों से अलग ॥६॥ "श्येनाय त्वा सोमभृते" (यजु० ६।३२) - "तुम सोम रखनेवाले श्येन के लिए।" यह गायत्री के लिए नापता है। "अग्ने त्वा रायस्पोषदे" (यजु० ६।३२) - "तुझ धन देनेवाले अग्नि के लिए।" अग्नि गायत्री है। इसको गायत्री के लिए नापता है। यह जो गायत्री श्येन होकर सोम को द्यौलोक में ले गई, इसलिए उसको 'सोमभृत श्येन' कहा। इसके उस पराक्रम के लिए वह दूसरा भाग बाँटता है (नापता है) ॥१०॥ पाँच बार क्यों नापता है ? यज्ञ की वही नाप है जो वर्ष में पाँच ऋतुएँ होती हैं। वह इसको पाँच भागों में लेता है। इसलिए पाँच बार नापता है ॥११॥