शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंका० ३, अ० ६, ब्रा० ४, क० १२-१८ शतपथब्राह्मण / ५२१ वह इस मन्त्र से छूता है—‘‘यत् ते सोम दिवि ज्योतिर्यत् पृथिव्यां यदुरावन्तरिक्षे । तेनास्मै यजमानायोरु राये कृध्यधि दात्रे वोचः’’ (यजु० ६।३३)—‘‘हे सोम, जो तेरा प्रकाश द्युलोक में है, जो पृथिवी में, जो अन्तरिक्ष में, उससे इस यजमान के लिए और उसके धन के लिए स्थान कर । दाता के लिए आज्ञा दे।’’ जब यह (सोम) देवों की हवि बना तो उसने चाहा कि मैं अपनी पूर्ण सत्ता (आत्मा) के साथ देवों का हवि न बनूँ। इसलिए उसने अपने तीन शरीरों को संसार में छोड़ दिया ॥१२॥ तब देव विजयी हो गये। उन्होंने इसी मन्त्र द्वारा उसके इन तीनों शरीरों को प्राप्त कर लिया, और वह सम्पूर्ण देवों का हवि हो गया। इसी प्रकार यह भी इसके शरीरों को प्राप्त करता है और यह सोम सम्पूर्णतया देवों का हवि हो जाता है। इसी कारण से वह इस प्रकार उसको छूता है ॥१३॥ अब निग्राह्य जल को उस पर छिड़कता है। जलों ने ही वृत्र को मारा। उसी पराक्रम से ये बहते हैं। इसीलिए जब जल बहते हैं तो कोई उनको रोक नहीं सकता। वे अपनी ही इच्छा से चले थे। उन्होंने सोचा कि जब हम वृत्र को मार चुके तो किसके लिए रुकें? सृष्टि में यह जो कुछ है वह सब इन्द्र के लिए रुक गया, यहाँ तक कि पवन भी ॥१४॥ इन्द्र बोला कि ‘सृष्टि में जो कुछ है सब मेरे लिए रुक गया। तुम भी रुको।' उन्होंने कहा कि ‘तो हमारा क्या होगा ?’ उसने कहा कि ‘सोम राजा का पहला घूंट तुमको मिलेगा।' उन्होंने कहा, ‘अच्छा।' वे उसके लिए रुक गये। जब वे उसके लिए रुक गये तो उसने उनको छाती से लगा लिया (न्यगृह्णीत), इसलिए इनका नाम ‘निग्राह्य' है। इसी प्रकार यह यजमान भी इनको छाती से लगाता है। यह उनका सोम राजा का पहला घूंट है कि वह इन जलों को (सोम पर) छोड़ता है ॥१५॥ वह इस मन्त्र से छोड़ता है—‘स्वात्रा स्थ वृत्रतुरः' (यजु० ६।३४) जल कल्याणकारक होते हैं इसलिए कहा—‘‘वृत्र को मारनेवाले कल्याणकारी’’ क्योंकि इन्होंने वृत्र को मारा। ‘‘राधोगूर्ताऽमृतस्य पत्नीः’’ (यजु० ६।३४)—‘‘ऐश्वर्य की देनेवाली अमृत की पत्नियां ।’’ जल अमृत हैं। ‘‘ता देवीर्देवत्रेमं यज्ञं नय’’ (यजु० ६।३४)—‘‘हे देवियो, देवों के लिए इस यज्ञ को ले जाओ।’’ यह सब स्पष्ट है। ‘‘उपहूताः सोमस्य पिबत’’ (यजु० ६।३४)—‘‘आप निमन्त्रित होकर सोम को पियो।’’ ये जल निमन्त्रित हैं और सोम राजा के पहले घूंट को पीते हैं ॥१६॥ जब सोम को कुचले तो मन में अपने शत्रु का विचार करे—‘मैं अमुक शत्रु को कुचलता हूँ। तुझको नहीं।' जो कोई ब्राह्मण मनुष्य को मारते हैं वे पाप करते हैं, फिर उनका क्या कहना जो सोम राजा का हनन करते हैं क्योंकि सोम तो देव है! ये जो उसको पत्थर से कुचलते हैं तो इसका हनन करते हैं। वहीं से वह उठता है, जीता है, इस प्रकार पाप नहीं होता। यदि कोई उसका शत्रु न हो तो तृण का ही चिन्तन कर ले। इससे भी पाप न लगेगा ॥१७॥ वह इस मन्त्र से कुचलता है—‘‘मा भेर्मा संविक्था’’ (यजु० ६।३५)—अर्थात् ‘‘डरे