शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकां० ३; अ० ६, ब्रा० ४, कं० १८-२४ शतपथब्राह्मण / ५२३ मत, कांपे मत ।" क्योंकि मैं अमुक को कुचलता हूँ, तुझको नहीं। "ऊर्जं धत्स्व" (यजु० ६।३५)- अर्थात् "रस को धारण कर ।" "धिषणे वीड़्वी सती वीड़ेयेथामूर्जं दधाथाम्" (यजु० ६।३५)- "हे निश्चल धिषण, तुम निश्चल रहो और रस को धारण करो।" कुछ लोग कहते हैं कि इससे उन दो पट्टों से तात्पर्य है। यदि इनको कोई तोड़ दे तो क्या हो ? ये वस्तुतः द्यौ और पृथिवी हैं जो इस उद्यत वज्र से कांपते हैं। इसलिए इसको शान्त करता है और यह शान्त होकर हानि नहीं पहुँचाता। 'ऊर्जं दधाथाम्' का अर्थ है 'रस को धारण कर ।' "पाप्मा हतो न सोमः" (यजु० ६।३५) -"पापी मर गया, न कि सोम।" इस प्रकार इसके सब पापों का नाश करता है ॥१८॥ वह तीन बार कुचलता है, तीन बार बटोरता है। चार बार निग्राभ-क्रिया करता है। इस प्रकार दस हुए। दस अक्षर का विराट् छन्द होता है। सोम विराट्वाला है। इस प्रकार दस बार में सम्पादन करता है ॥१९॥ वह निग्राभ-क्रिया क्यों करता है? जब यह सोम पहले देवताओं की हवि बना तो इसने इन चार दिशाओं का ध्यान किया कि मैं इन चार दिशाओं के द्वारा अपने प्रिय तेज का स्पर्श करूँ। निग्राभ के द्वारा देवों ने इन दिशाओं से प्रिय प्रकाश के साथ स्पर्श कराया। यह यजमान भी निग्राभ करके इन दिशाओं के द्वारा प्रिय प्रकाश से इसका स्पर्श कराता है ॥२०॥ वह (निग्राभ क्रिया) इस मन्त्र से करता है- "प्रागपागुदगधराक् सर्वतस्त्वा दिशऽ- आधावन्तु" (यजु० ६।३६) - "पूर्व से, पश्चिम से, उत्तर से, दक्षिण से, चारों ओर से दिशाएँ तुझे धारण करें।" इस प्रकार वह दिशाओं से उसका जोड़ा मिला देता है, उसके प्रिय प्रकाश से। "अम्ब निष्पर समरीर्विदाम्" (यजु० ६।३६) - "हे मा, इसको सन्तुष्ट कर। उच्च लोग मिलें।" 'अम्बा' स्त्री हैं। 'दिशाएँ' स्त्री हैं। इसलिए कहा, 'अम्ब निष्पर।' 'अरीः' प्रजा हैं। इसका तात्पर्य है कि प्रजाएँ परस्पर मेल से रहें। जो दूर-दूर रहते हैं वे भी मेल से रहते हैं। इसलिए कहा कि प्रजाएँ मेल से रहें ॥२१॥ अब सोम नाम क्यों पड़ा ? जब यह पहले देवताओं का हवि बना तो इसने चाहा कि मैं अपनी पूर्ण सत्ता से देवों का हवि न बनूं। उसका जो सबसे प्यारा शरीर (अंश) था उसको उसने अलग कर लिया। अब देव विजयी हो गये। उन्होंने कहा, 'तू इसको अपने में धारण कर। तब तू हमारा हवि होगा।' उसने उस अपने अंश को दूर से खींच लिया। यह मेरा ही है। (स्वा वं म) इससे सोम हो गया ॥२२॥ इसको यज्ञ क्यों कहते हैं ? जब उसको कुचलते हैं तो उसको मारते हैं। जब उसको फैलाते हैं तो उसको उत्पन्न करते हैं। वह फैलाया जाकर उत्पन्न होता है। उत्पन्न होता है, इसलिए 'यन् जायते', 'यञ्ज', 'यज्ञ' हुआ ॥२३॥ उसने उस समय यह कहा- "त्वमङ्ग प्रशँसिषो देवः शविष्ठ मर्त्यम् । न त्वदन्यो मघवन्नस्ति मर्डितेन्द्र ब्रवीमि ते वचः" (यजु० ६।३७, ऋ० १।८४।१६) -"हे श्रेष्ठ देव, तू